Wednesday, December 22, 2010

apnapan

जब भी करती हूँ तुमसे बातें ,
अपने - आप को पा जाती हूँ ,
न दिखावा ,
न छलावा,
न बनावट ,
न सजावट ,
बस मन की परतों को खोलती जाती हूँ |
तुम भी तो ,
मंद - मंद मुस्कुराते ,
कोरों से मुझे पीते,
मेरी मस्ती ,
मेरी चंचलता ,
मेरा अल्हड़पन ,
मेरा अपनापन ,
हल्के से
थाम लेते हो हाथ मेरा |
काँप जाती हूँ ,
नाज़ुक लता सी ,
और लिपट जाती हूँ शाख से |

Monday, December 20, 2010

nadi si


तुमसे जब भी बात करती हूँ ,
उतर आती है नदी मेरी आँखों में ,
तुम्हारे स्वरों की लहरों में ,
डूबती - उतरती - बहती हूँ ,
कभी तेज , कभी मंथर ,
...गोल - गोल भंवर सी ,
इतराती - बलखाती - अल्हड़,
समा जाती हूँ तुम्हारी आँखों के समुद्र में ,
तुम भी साथ - साथ बहते - बहते ,
मुझे भर कर बाहों में हर बार ,
विलीन हो जाते हो प्रियतम बार - बार |

Thursday, December 16, 2010

Kitaab - si

वह
पुरातान ग्रन्थ सी ,
सिर्फ बैठेक की शेल्फ पर सजती हैं  |
वह
सस्ते नॉवेल सी ,
सिर्फ फुटपाथ पर बिकती हैं  |
वह
मनोरंजक पुस्तक सी
उधार लेकर पढ़ी जाती हैं  |
वह
ज्ञानवर्धक किताब सी ,
सिर्फ जरुरत होने पर पलटी जाती हैं  |
गन्दी , थूक, लगी उँगलियों से ,
मोड़ी, पलटी , और उमेठी जाती हैं |

पढ़ो हमें सफाई से ,
एक - एक पन्ना एहतियात से पलटते हुए ,
हम सिर्फ समय काटने का सामान नहीं ,
हम भी इन्सान है , उपहार में मिली किताब नहीं .................

Sunday, December 12, 2010

Munni badnaam hui

कल रात एक वारदात हुई , कॉल - सेंटर से लौटते हुए ,
मुन्नी बदनाम हुई .............|
गली - नुक्कड़ - और मिडिया में , इसकी चर्चा सारे आम हुई |
किसी ने कहा भई , क्या ज़माना आ गया है ,
इन लड़कियों को फैशन कम करना चाहिए ,
अपने - आप मुसीबत को न्योता देती हैं ,
फिर उस बात को ले कर कोर्ट - कचहरी में रोती हैं |
मतलब अगर पर्दा रह गया तो , अपराध कम हो जायेंगे ,
फिर यह भेड़िये नज़र नहीं उठा पायेंगे ?
तो फिर क्यों न ऐसा किया जाये ,
उन दरिंदों की आँखों पर पट्टियाँ , बांध दी जाये |
ताकि हर मुन्नी चैन की साँस ले सके ,
विक्षिप्त इस समाज में इज्ज़त से जी सके |

Friday, December 10, 2010

Zindgi

जिंदा हूँ मगर , जिंदगी ढूनढती हूँ |
हैवानों के शहर में , इंसानों को ढूनढती   हूँ |
सोने - चाँदी के बाज़ार मे फूलों को ढूनढती   हूँ |
बंद घुटती दीवारों में , खुला आकाश ढूनढती   हूँ |
काली - भयावह रात में , रोशनी की रसधार ढूनढती   हूँ |
बनावटी - खोखली हंसी में , मासूम मुस्कराहट को ढूनढती   हूँ |
आधे - अधूरे शब्दों में , संवाद को ढूनढती   हूँ |
रुखी - सुखी इस जिंदगी में , प्यार का दीदार ढूनढती   हूँ |

Monday, December 6, 2010

Shabd

शब्दों का माया जाल ..
रंगहीन ,
गंधहीन ,
 सम्वेदेन्हीन ,
शब्द कोरे शब्द .....
खोखले ,
बनावटी ,
मटमैले ,
पन्नों पर बिखरे - बिखरे ...
हवा में तिरते - तिरते ,
सर्पीली गुंजलिका से ,
शब्द ही शब्द ........
मेरे होठों से ,
तुम्हारे कानों तक ,
रूप बदलते ....
कलम की स्याही से ,
दिल की गहराई तक ,
अर्थ बदलते .....
शब्द ........शब्द ........ आधे ...अधूरे |

Sunday, December 5, 2010

meri pachaan

मैं तो हूँ मस्त बयार , बांधने की तुम्हारी कोशिश  है बेकार |
यह भटकन - अटकन -उलझन,  ही तो है मेरी पहचान |
निर्द्वंद , अबाध , बहती ,...
निर्मल , शीतल , सुगन्धित ...
प्यार और त्रास भी ...
प्यास और पानी भी ..
जीत भी और हार भी ...
सवाल भी और जवाब भी ...
मैं तो हूँ मस्त बयार , बांधने की तुम्हारी कोशिश है बेकार ........|

Sunday, November 28, 2010

bhybheet

सतह पर काई सी तैरती ,
डूबने से आतंकित ,
बहने दो बहने दो .........
मन में मंद मुस्काती ,
हंसने से भयभीत ,
जीने दो जीने दो ........
हवा में फाये से फरफराती ,
गिरने से त्रासित,
उड़ने दो उड़ने दो .............
गगन में बूंद सी थरथराती ,
गिरने को बेकाबू ,
बरसने दो बरसने दो ..............

Saturday, November 27, 2010

vaqt -3

जब आँखों में ऑंखें झाँकेंगी,
तब वक़्त वहीँ थम जाएगा ,
देख के साँसों का मिलन ,
यह चाँद भी जल जाएगा ,
इश्क वक़्त का मोहताज़ नहीं ,
इस लम्हें में मैनें जाना ,
जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
वक़्त मुट्ठी में दबा लाना |

tab samjh ayaa

आज धुंधला - धुंधला दिखा ,
अपना ही प्रतिबिम्ब दर्पण में,
बार - बार पौंछती रही  उसे ,
फिर भी चमका न सकी आईना |
अचानक हथेली से संभाली लट,
तो छू गया गीलापन ,
तब समझ आया ,
क्यों धुंधलाई है अपनी परछायीं |
सहसा असपष्ट होने लगे अक्षर ,
पढ़ न सकी तुम्हारी लिखावट ,
कभी दूर - कभी पास करती रही पन्ने ,
फिर भी साफ़ न हो सकी निगाह ,
अकस्मात टपक गयी एक बूंद ,
तब समझ आया ,
क्यों धुंधलाई है तुम्हारी इबारत ................

Wednesday, November 24, 2010

Jeevan ki dhuri

पता नहीं क्यों , जब होता है शुरू दिन ,
चाहे जब भी ,उस हर पल की
धुरी तुम क्यों बन जाते हो ...
स्वयं ही |
भोर की पहली किरण छूती है मुझे ,
गुलाल हो जाती हूँ , तुम्हारे अहसास से |
बहती हवा का झोंका लहरा जाता है केश ,
उंगलियाँ तुम्हारी फिर जाती हैं जैसे |
चमकती किरणों की जलती चुभन ,
लबों पर मानो तुम्हारी जुम्बिश |
शाम की ढलती लाली का सुर्ख अबीर ,
तुम्हारी चाहत का रंग जैसे मेरे संग |
सुरमई आकाश पर चन्द्र की शीतलता ,
खो कर पाने की यही है सम्पूर्णता |
पता नहीं क्यों , जब होता है शुरू दिन ,
चाहे जब भी ,उस हर पल की
धुरी तुम क्यों बन जाते हो ...
स्वयं ही ....................

Monday, November 22, 2010

bas tum hi tum

हवा में महक सी तुम ,
धूप में किरण सी तुम ,
भोर में ओस सी तुम ,
बादल  में बिजली सी तुम ,
नदी में गति सी तुम ,
आँखों में चमक सी तुम ,
दिल में धड़कन सी तुम ,
होठों में ध्वनि  सी तुम ,
सपनों में जीवित सी तुम ,
भीड़ में तनहाई सी तुम ,
अब और कोई नहीं आता नज़र ..
जहाँ देखूँ सिर्फ तुम ही तुम ...........

pinjrey ki bulbul

राजा को भा गयी सुनहरी बुलबुल ,
बुलबुल भी राजा को पा सब गयी भूल |
राजा की ही हाँ में हाँ  मिलाती थी ,
राजा के लिए ही हँसती और गाती थी |
अपने कतरे पंख देख कर इतराती थी ,
अपने नए रूप पर स्वयं इठलाती थी |
अपनी उड़ान भूल , फुदकने लगी ,
बंद कमरे के दायरे में टहलने लगी |
इसी को अपनी नियति मान रम गई ,
यही दुनिया उसके तन - मन में बस गयी |
बंद खिड़की , दरवाज़े के पास जब भी गुजरती ,
भीतर कितना सुख है वह यह सोचती |
एक दिन खिड़की खुली रह गयी ,
वह चौखट पर जा कर जम गयी |
ताक रही थी खुला आकाश और हरी घास ,
दिल में जागी नयी उमंग और आस |
राजा के तेवर देख वापस लौट चली ,
अपने अरमान मन में ही कुचल गयी |
शायद अब मैं कभी उड़ न पाऊँगी,
सारी बस उम्र यूँ ही गवायुंगी|

Sunday, November 21, 2010

samsya kaa samadhaan

सामने चल रहा था के० बी० सी०,
और जवाब दे रहे थे हम |
हर प्रश्न का उत्तर ,
जुबान पर था जड़ा,
जैसे हमारे लिए ही था गड़ा |
कहीं न हो रही थी हमसे भूल ,
न हो रही थी हमसे कोई चुक |
सभी सीढ़ियाँ फटाफट चढ़ते चले गए ,
किस्मत के ताले सरपट खुलते चले गए |
पर , हाय सारा कार्यक्रम चल रहा था टी० वी० पर ,
और हम बैठे थे अपने घर की हॉट सीट पर |
ऐसा क्यों होता है , जब समस्या हो किसी और की ,
सारे समाधान होते हैं हमारे पास ,
वही कठिनाई जब होती है अपनी ,
तो अक्ल हो जाती है गुम और शरीर हो जाता है सुन्न |
दूसरे के फटे में टांग अड़ाना आदत है ,
अपनी बात स्वयं सुलझाना मुसीबत है |
दूसरों को सलाह देते हम थकते नहीं ,
अपने आंगन में हम झंकते नहीं |
कितना अच्छा हो , अगर हम दूसरों से पहले अपनी सुने ,
किसी को कहने से पहले अपना मन गुने |

Tuesday, November 16, 2010

Jab


जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
हल्की धूप , थोड़ी हवा ,
आँखों मे सजा लाना ,
डालकर नैनों में नैन तुम्हारे ,
विचरुंगी जहाँ सारा |
...जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
चंद बादल, एक कतरा आस्मां ,
दिल में अपने दबा लाना ,
बाँहों में सिमिट कर तुम्हारी ,
जी जाऊँगी जीवन सारा |

Saturday, November 13, 2010

kuch nahi

यह जो तरफ महकी - महकी सी हवा भरमाई है ,
कुछ और नहीं पिया , मेरी यादों की गहराई है |

यह जो चारों तरफ उजली - उजली सी धूप खिलखिलाई है ,
कुछ और नहीं पिया , तेरी याद में आँख शरमाई है |

यह जो चारों तरफ हल्की - हल्की सी धुंध छाई   है ,
कुछ और नहीं पिया, अपने महामिलन की परछायी है |

Tuesday, November 9, 2010

tumhara sapnaa

आज , अपनी आँखों में देखा ,
तुम्हारे सपने को देखा |
पाया अपने आप को वहाँ ,
हर जगह सर्वत्र ,
अपलक ताक रहे थे तुम  ,
नन्हे बालक की भांति |
और मैं मौन , मुस्कराती ,
भांप रही थी तुम्हारी  ,
उत्सुकता तथा आकुलता |
उन कुछ पलों मे ,
गुजर गए अनगिनत युग |
खुली पलक , टूटा सपना ,
तुम   थे वहीं , तुम हो जहाँ |
न हो यहाँ , न हो वहाँ |
तन से वहाँ, मन से यहाँ |
 

Sunday, November 7, 2010

ansuni baat

न तुमने कुछ कहा ,
न मैंने कुछ सुना ,
फिर भी बात हमारी हो गयी |
मेरे आंगन खिला चाँद ,
तेरे आंगन उगा सूरज ,
क्षितिज के पार मुलाकात हमारी हो गयी |
तुमने करी बंद पलकें ,
मैने खोली  अलकें ,
स्वप्नों के दरिया मे कश्ती हमारी खो गयी |
तुमने देखा एक ख्वाब ,
मैने जिया वह अहसास ,
दोनों के दिल की धड़कन एक हो गयी................

Thursday, November 4, 2010

achank

कुछ देर साथ चले ,
गए फिर बिछुड़ ,
मन की तख्ती से पोंछ दिया नाम |
न था कोई संवाद ,
न ही कोई अहसास |
फिर अचानक ,
एक दिन ,
हज़ारों की भीड़ में ,
दिख पड़े .....
लहक गयी अग्निरेखा ,
कम्पन हुआ घने बादलों मे ,
और
रोशन  हुआ  
दिल का कोना - कोना ..........

Wednesday, November 3, 2010

Diwali

इस बरस हो ऐसी दिवाली ,
न हो कोई भी झोली खाली ,
खिल जाये उम्मीदों की डाली - डाली |
पूरी हो सबके मन की आशा ,
दुःख-दर्द मिटे ,दूर हो निराशा |
भेद -भाव की मिट जाये खाई ,
मिल जाये आपस मे भाई - भाई |
खुली आँखों में जले सपने सी बाती,
हर किसीको मिले मनचाहा साथी |
अपनेपन का दिया जले हर आंगन,
इस बरस दिवाली हो सबकी मनभावन ||

Monday, October 25, 2010

tumhari yaad

जब भी सोचती हूँ तुम्हें ,
उभर आता है नीला आकाश ,
ऊँची - ऊँची चोटियाँ,
कल - कल बहती नदी ,
लम्बे - घने पेड़ ,
काली- स्यहा चट्टानें ,
और
एक पुराना मंदिर |
जहाँ बरसों से ,
कोई दिया न जला ,
परिंदा न गया ,
न घंटी, न धूप |
आओ हम - तुम मिल कर ,
धर दे देहरी पर ,
दीपक एक जलता हुआ ,
प्रतीक तेरे - मेरे एक होने का |

Sunday, October 17, 2010

vaqt

जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
वक़्त मुट्ठी में दबा लाना |
कंधे पर तुम्हारे सिर रखकर ,
देखूँगी की चाँद का धीरे- धीरे आना |
मैं कस कर थाम लूँगी तुम्हारी मुट्ठी ,
लेकर हाथों में  हाथ तुम्हारा |
दोनों मिलकर रोक लेंगे ,
पोरों से फिसलता वक़्त हमारा |
सीने पर  तुम्हारे सिर रखकर ,
देखूँगी चाँद का धीरे - धीरे जाना |
जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
वक़्त मुट्ठी में दबा लाना |

Wednesday, September 22, 2010

maa ne kaha thaa

माँ ने कहा था
माँ ने हमेशा कहा ...
नज़रे नीची ,
सर झुका ,
विनम्र हमेशा ,
जुबान पर ताला,
सवाल का जवाब नहीं ,
सामंजस्य बनाये रखना |
अपनी नहीं , दूसरों की सुनना ,
हर बात ध्यान से सुन  ,
उस पर अमल करना |

माँ तेरी कोई नसीहत काम नहीं आई .....
जो जितना झुकता है ,
उतना ही झुकया जाता है |
खमोशी को अकड़ समझा जाता है |
हर रोज़ नया फिकरा कसा जाता है |
दूसरों की सुनते - सुनते ,
तेरी लाली अपने को भूल गयी |
तालमेल के इस बंधन में ,
त्रिशंकू सी झूल गयी |

काश ! तूने कहा होता ....
अपनी अस्मिता और पहचान न खोना ,
कमज़ोर नहीं है तू , एक इन्सान है,
तेरी भी अपनी ज़रूरत और माँग  है |

तेरी नसीहत की पट्टी अब भी गुनगुनाती हूँ ,
शब्दों को अदल - बदल कर ,
अपनी बिटिया को सुनाती हूँ ,
ऐसे कर्म करना , तुम्हारा हो नाम  ,
तू मात्र कठपुतली नहीं , न ही है घर का सामान,
रिश्ते बनाना , निभाना पर ढोना नहीं ,
 एक ही जीवन है मजबूरी में बिताना नहीं .............

इति

Tuesday, September 21, 2010

kuch teraa- kuch meraa

मन के उजियारे पन्ने पर , यादों की स्याही में डुबो ,
दिल की कलम से , नाम लिखा कई ब़ार ,
प्रिय कभी तेरा , कभी मेरा |

उगते सूरज की पहली किरण , ढलते चाँद की शीतलता ,
हर लम्हा हम हो साथ सनम , खिल जाये दिल का कोना - कोना ,
प्रिय कभी तेरा , कभी मेरा |

सोती - जगती इन आँखों ने कुछ ख्वाब बुने ,
पेड़ो की छांव तले , चरमराते पत्तों के बीच,चले थामे एक -दूजे का हाथ ,
प्रिय कभी तेरा , कभी मेरा |

तारों भरी  रात , जुगनुओं की बारात ,
चटकती चांदनी में हो मिलन की बरसात ,संग हमारे  हवा भी गुनगुनाये    गीत ,
प्रिय कभी तेरा , कभी मेरा |

अनजानी - अन्चिह्नी  राहों पर ,
यूँ ही बस चलते चले जाये ,हवा , पत्ते , बादल बस एक नाम पुकारे ,
प्रिय कभी तेरा , कभी मेरा |

Monday, September 20, 2010

unchii dukaan Fikaa pakwan

एक था कल्लू , उसका था कोल्हू |
एक था भेरों, उसका था ठेला |
एक थी चंदा , उसका था भाड़ |
एक था राधे , उसका था पान भंडार |
ये सब बस नाम नहीं , पहचान थे |
अपने फन में माहिर , उस बाज़ार की शान थे |
टूट गया कोल्हू , छूट गया ठेला |
फूट गया भाड़ , गिर गया भंडार |
अब है यहाँ एक शानदार मॉल |
चमचमाता फर्श , जगमाती रोशनी |
टिमटिमाते बल्ब , नकली हँसी |
छुरी- कांटे , थेयेटर, कारों की कतार |
उंची दुकान, फीका पकवान ..........

Tuesday, September 14, 2010

band khazanaa

सूखी वे पाँखुरियाँ,
आज भी ताज़ा हैं ,
पीले - मटमैले पन्नो में |

उलझी है लट,
आज भी माथे पे ,
छुई थी जो तूने बार -बार |

पलकों मे मोती ,
रखे हैं अभी तक ,
याद है उन लम्हों की |

दुपट्टे का कोना ,
अनछुआ , अनधुला है ,
फेरा था चहेरे पर जिसे |

चिंदी -चिंदी वह टिकेट ,
बटुए के कोने मे है दबा ,
साथ बिताये पलों  की दास्तान |

ये सब बंद है ,
मन की सिलवटों में ,
जब - तब खोल जिसे झाँक आती हूँ ,
एक नया जीवन जी आती हूँ ............

इति ....

Friday, September 10, 2010

purani yaad

बरसों बाद भाई आया ,
पुरानी यादें साथ लाया |
वह रूठना -मनाना , झगड़ा और शोर ,
तुझसे बंधी है बचपन की डोर |
कंचे, लट्टू , वो काटा की धूम ,
हरा समुंदर , मछली रानी गोल - गोल घूम |
ठेले की कुल्फी ,छल्ली और बुड्ढी के बाल,
हँसते - खेलते निकल गए कितने ही साल |
तेरे माथे पर मेरे नाख़ून के निशान,
तूने भी काटे थे सोते हुए मेरे बाल |
मैने बनाई तेरे  पोस्टर पर मूँछ और पूँछ,
आज तक वह बात तू नहीं पाया है भूल |
ढूध के अनगिनत ग्लास बहाए  थे हमने ,
रिपोर्ट कार्ड के कितने पन्ने छिपाए थे हमने |
अब भी याद है माँ के जाते ही रसोई में जाना ,
चाय बनाते - बनाते बर्तन का जलाना |
रात होते ही छत पर लपकना ,
पंखे के सामने ही चरपाई हडपना |
राज़ की बात एक - दूसरे को बताते थे ,
फिर उसी बात पर एक दूसरे को धमकाते थे |
पल मे दुश्मन , पल मे दोस्त थे हम ,
न कोई चिंता ,न फ़िक्र न थे गम |
कितने मधुर सुहाने थे वो  दिन और रात ,
अब तो बस यह सब है पुरानी याद |..........

इति ..........

Tuesday, August 31, 2010

Ghar kaa Angan

जब मैं छोटी थी ,
मेरे घर का आंगन बहुत बड़ा था,
उसमें समाया था पूरा मोहल्ल्ला |
सामने घर में जलते तंदूर की खुशबू ,

हमारे आंगन तक आती थी |
वहाँ पकती सौंधी- सौंधी रोटी ,
हर किसी को बांटी जाती थी |
स्कूल से आते ही ,बस्ता पटक ,
गली में निकल जाते थे ,
कंचे ,गिल्ली -डंडा और वो काटा के शोर से ,
हर आने -जाने वाले को सताते थे |
हमारे आंगन की धूप , सबकी सांझी थी |
अचार , पापड, स्वेटर के फंदे ,
रिश्ते -नाते, हारी -बीमारी सब यहीं निबटते थे |
आधी रात को , चंदू की माँ की बीमारी सुन ,
अब्दुल भागा- भागा  आया था ,
अपनी साईकल गिरवी रख ,वही दवा लाया था |
रधिया की शादी में पूरा मोहल्ला रोया था ,
पीटर की रतजगे मे कोई रात भर नहीं सोया था |
 कुलवंत भाभी की रजाई के धागे माँ ही डाला करती  थी ,
दादी के घुटनों की मालिश सब बारी से कर जाती थी|
एक ही टीवी सबको एक साथ  हँसता  - और रुलाता था
एक ही फ्रिज  सबके काम आ जाता था ,
टेलीफोन  की घंटी सुन ,चार घर दूर जाते थे ,
बातों के साथ , चाय भी पी आते थे |

अब मैं  हो गयी हूँ बड़ी  और सिमट गया है आंगन |
न है तंदूर और गली का शोर ,
हर घर का अपना है राग और अपना ही किस्सा,
अब नहीं बनता कोई किसी  का  हिस्सा ,
सब काम अब चुपचाप  निबट जाते है ,
हम भी शादी की भीड़ मे शगुन दे आते हैं |
सिकुड़ गये है रिश्ते , बदल गयी है निगाहें ,
जलन , इर्ष्या और नफरत की खड़ी है दीवार ,
मेरे घर के आंगन मे अब धूप  नहीं आती ,
दोपहर से पहले ही साँझ चली आती है |
अब मैं हो गयी हूँ बड़ी  और सिमट गया है आंगन |
इति....

Thursday, August 19, 2010

samarpan

होठों  की हँसी,
आँखों की नमी ,
घुलमिल कर एक हुई |
तुम्हारे आने से ,
मेरे होने की पहचान परिपूर्ण हुई |
तुम में अपने को खो कर ,
आज मैं सम्पूर्ण हुई |
इति ...

Tuesday, August 17, 2010

Aek Vichaar

जीवित
है बस एक एहसास ,
मैं हूँ
सिर्फ एक आधार ......
बेटी ….पत्नी …..जननी
...या .......साधारण इंसान ?
अस्तिव की
पहचान .........
खोखलापन ….वेदना ….अहम् …


एक
विचार ..................?

Tuesday, August 10, 2010

RISHTAA

तेरा- मेरा रिश्ता है परे ,
झूठी परिभाषाओं से ...........
गुनगुनी धूप - सा ,
मद - मस्त - अलसाया |
नीले खुले अम्बर - सा ,
उन्मुक्त - विस्तृत - धुला -धुला |
बहती धारा - सा ,
निर्द्वंद - निश्छल - अल्हड़ |
कौंधती बिजली - सा ,
चपल - चंचल - रोशन |
बहती बयार - सा ,
शीतल - सुगन्धित - दुलारता |
तेरा - मेरा रिश्ता है परे ,
झूठी परिभाषाओं से .............

Friday, July 23, 2010

दोस्ती

दोस्ती
वे सब रहे बरसों साथ - साथ ,
सपने थे अलग - अलग, फिर भी पास - पास |
चल पड़े सब अपनी - अपनी राह ,
किसने जाने क्या -क्या सहा |
कोई चला ,चलता ही गया ,
कोई उठा ,उठता ही गया |
कोई चला कहीं, पहुँचा कहीं,
कोई घूम फिर कर रहा वहीं का वहीं |
किसीको बदलनी पड़ी, अपनी राह ,
कोई चलते -चलते, भटक गया राह |
कुछ के फले, कुछ के बदले ,
अब क्या पूछना तुम कब ,कहाँ निकले |
आज भी एक सिरा है उन्हें है जोड़ रहा ,
यही काफी है , जो भी मिला हँस के मिला |
............

Wednesday, July 21, 2010

yaad

याद है ...
चलते - चलते ...
हम दोनों ...
एक साथ ,
कितने मोड़ , मुड़ जाते थे,
बेमतलब , बेपरवाह ...
चलते - चले जाते थे ...|
मै आज भी उस मोड़ पर खड़ी हूँ ,
तुम प्रिय बहुत दूर निकल गए .............

Tuesday, July 13, 2010

beti ki pukaar

मत मार , मत मार , माँ मुझे मत मार ,
मैं तो  हूँ तेरा ही प्राण ,
फिर तू कैसे हो गयी इतनी कठोर , निष्प्राण ?

तुझे मार कर , कर रही हूँ  अपना और तेरा उद्धार ,
आज भी इस समाज में तेरा जीना है दुष्वार |
आज भी तेरे लिए है अग्नि परीक्षा ,
आज भी भरी सभा में है अपमान ,
किसी का कलंक तेरे लिए है श्राप |

पर जो यह सब नारे हैं -----
"बेटी कुदरत का उपहार है , न करो इसका तिरस्कार  "

यह सब बेमानी हैं , अखबारों और पत्रिका में छापे जाते  हैं ,
गावों- शहरों की दीवारों पर लिपे जाते हैं |
नेताओं के मुहं से बोले जाते हैं |
सच तो यह है ----

आज भी तू कोड़ियों के दाम बिकती है ,
दहेज की बलिदेवी पर चढ़ती है ,
रंग - रूप के आधार  पर छनती है,
खुले आम बाज़ारों मे सजती है ,
बदले के लिए तू ही है सस्ता शिकार ,
इसलिए हर ब़ार तुझ पर ही होता है वार |

माँ हूँ तेरी , नहीं सह सकती यह अत्याचार ,
इसलिए आज तेरे उदगम स्थल पर ही  ,
करती हूँ मैं तेरा बहिष्कार ||

इति ............

Wednesday, July 7, 2010

uchaai

वह ऊँचा पहाड़ , नंगा खड़ा था |
गर्व से उसका माथा चड़ा था |
न पेड़ , न पौधे , न ही घास थी वहाँ |
पहुँचे अनेक , पर रुके  नहीं वहाँ |
सबसे अलग महान और एकाकी |
न चिड़िया - पंछी न हवा थी बाकी |
चेहेरे पर मुस्कान दिल मे दर्द छिपाए  |
रंगों - संगो को वह है  तरसता रहे |
यही है इतना  ऊँचे होने की मज़बूरी  |
जो बड़ा देती है अपनों से दूरी  |
इसलिए मै अपने आमपन मे ही खुश हूँ |
भीड़ मे खोकर भी,  अपने आप मे  ख़ास हूँ |

इति ......

Monday, July 5, 2010

mujhe chaiye

मुझे चाहिये घर ,
बंद दीवारें नहीं |
मुझे चाहिये हंसी ,
गहनों की झंकार नहीं |
मुझे चाहिये समय ,
एक युग नहीं |
मुझे चाहिये खुला आकाश ,
पूरी कायनात नहीं |
मुझे चाहिये आँखों के जाम ,
पूरा मयखाना नहीं |
मुझे चाहिये एक साथी ,
रखवाला नहीं |
मुझे चाइए एक इन्सान ,
भगवान नहीं |

इति.............

Saturday, July 3, 2010

sapno ki duniyaa

वह छोटी सी चिड़िया ,
एकांत की तलाश में , दूर बहुत निकल गयी |
शीतल ताल ,
सुनहरा आकाश ,
ऊँचा पहाड़ ,
पाकर वही बस गयी |
आबादी का कोलाहल ,
रिश्ते का धूयाँ ,
यादों की मिट्टी,
को वह अब तरस गयी |
पलकों का गीलापन ,
होठों की हंसी ,
दिल की चाहत ,
सपनों की दुनिया बन गयी |

.........इति ...........

Sunday, June 27, 2010

aek cheraa

चाँद के चहेरे पर एक अक्स नज़र आता है ,
याद है जब एक साथ घंटो चाँद को निहारा करते थे ,
आज भी नज़र आती है तुम्हारी आंखे चाँद मे,
एक खामोश गर्माहट फैल जाती है चारो तरफ ,
उस गर्माहट की चादर लपेट ,
इंतजार करती हूँ अगली रात का |

इति .........

rishta

समपर्ण ..............
सम्पूर्ण समपर्ण ............
चाह कर भी नहीं हो पाता ,
विद्रोही मन मेरा ,
प्रशनों  की दीवार पर अटक जाता है ,
रिश्तों का यह ताना - बाना,
जितना सुलझाती हूँ ,
उतना ही  उलझता जाता है |

इति.........

Friday, June 25, 2010

kyuoki

क्योकि वह याद था ,
साथ है |
क्योंकि वह गीत था,
आवाज़ है |
क्योंकि वह धड़कन था ,
अहसास है |
क्योंकि वह दीपक था ,
प्रकाश है |
क्योंकि वह साँस था ,
आस है |
क्योंकि वह हमारा  था ,
पहचान  है |


इति ..............

Wednesday, June 23, 2010

Kyuoki

क्योकि वह बादल था ,
बरस गया |
क्योकि वह सपना था ,
टूट गया |
क्योकि वह तारा था ,
डूब गया |
क्योकि वह वक़्त था ,
बीत  गया |
क्योकि वह आंसू था ,
छलक गया |
क्योकि वह हमारा था ,
छूट गया |

इति ...........

Monday, June 21, 2010

swym

स्वयं ने ,
स्वयं को,
स्वयं से कहा ,
स्वयं के लिए ,
स्वयं से कुछ करना चाहिए |
स्वयं की खातिर ,
स्वयं पर मरना चाहिए |
स्वयं कहता रहा .....हे , रे . अरे !!!!!!!!

Wednesday, June 16, 2010

ahsas

यह आधा - अधूरा सपना मेरा ,
अक्सर मुझे रातो को जगाता है |
तुम्हारे आस पास होने का भ्रम ,
मुझे चक्रव्यूह  सा भरमाता है |
ब़ार - ब़ार छूती हूँ माथे की लकीरों को ,
जहाँ छुआ था तुमने ,
वह गर्म अहसास अभी भी मुझे ,
अग्निशिखा सा जलाता  है |

इति ..............

Sunday, May 16, 2010

Maa

माँ
लोरी , थपकी
पल्लू , चवन्नी
दाल , छोंक
मलहम , पट्टी
डांट , फटकार
लुकाछिपी , खिखिलाहट
चाय की भाप ,
स्वेटर के फंदे ,
फ़ॉर्क की तुरपन ,
धमकी , नसीहत ,
समस्या  का हल ,
दोस्त तो कभी जासूस ,
समय की घडी ,
अगरबत्ती की खुशबू,
गुड और चना ,
गाजर का हलवा
अचार की फांक
जादू की पिटारी

माँ..माँ...माँ..

Friday, May 14, 2010

Band Khidki

काफी अरसे के बाद बंद खिड़की खुली ,
तन मन को हर्षित कर गयी .
यादो की पिटारी जो कब से सहेज रखी थी ,
परत दर परत खुल गयी .
घास ,फूल , धूप की महक ,
हर कोने को छू गयी ,
खिलखिलाना ,मनाना, रूठ जाना ,
सब यादे तरोताजा हो गयी .
बड़ा लम्बा सफ़र है यह ,
मुड़ कर देखा तो पाया .
एक उम्र पीछे छोड़ आये है हम .

इति

Sunday, May 9, 2010

dayra

कितने दायरे में बंधे है हम |
दायरे , जो खींचे है स्वय हमने,
अपने चारो ओर |
दायरा , टूटते ही ,
मच गया शोर ,
चारो ओर |
उठने लगी निगाहे ,
तीखी , बेधती सी |
ये उठती निगाहे ,
धकेल देती है ,
वापिस अपने दायरे की ओर |
दायरे,  जो बनते जा रहे है ,
दलदल |
ओर हम धंसते जा रहे है ,
गहरे ,
छटपटआते ,
अवश |
..........................

Friday, May 7, 2010

audhre sapne

एक टुकड़ा धूप,
थोड़ी सी छाँव.
ज्यादा तो नहीं चाहा,
पर पूरी न हुई .
जिन्दगी इसी का नाम है .
अधूरे ही सही कुछ सपने ,
पूरे तो हुए .

Sunday, March 7, 2010

slib

सलीब
हम सब टंगे  है  अपनी - अपनी सलीब पर
ईसा को तो , ठोका था औरो ने ,
हम मजबूर स्वयं को ठोकते है |

औरो ने ठोका  तो आप महान ,
और हम खुद ही टंगे , तो मात्र मानव?
.......................

Friday, February 19, 2010

kahi - ankahi

कही - अनकही
परिपूर्ण  , फिर भी शुन्य .
दूर ,फिर भी  अन्तस्थ .
गहन , फिर सूक्ष्म .
संचित , फिर भी हीन.
अमूल्य , फिर भी नगण्य .
भरपूर फिर भी रिक्त .








Wednesday, February 3, 2010

सपने

सपने मुट्ठी में बंन्द रेत ,
कितना सहेजो , कितना बांधो ,
बिखअरेगी ही ।

अधुरा सम्वाद

तुम जो मेरे अपने हो
फिर यह रेखा  बांट्ती सी
या बांटने के भ्रम सी
क्यों आती है मध्य हमारे

सुनो प्रिय , आवश्यक है,
रेखा का बीच मे आना ।
क्योंकि आवश्यक है,
अस्तित्व का बना रहना ।
अपनी अस्मिता , पह्चान ,
बहुत अधिक सार्थक है ।
अतः कभी भी नही निकल पाओगी ,
इस भ्रम से ॥

यही अस्मिता की सार्थक्अता ,
तो है रेखा बाटंती सी ॥