Sunday, January 23, 2011

अम्मा का बहाना

माँ बार - बार ऑंखें रगड़ रही थीं ,
"आज लकड़ी बहुत गीली है ,"
खिसयानी हँसी कुछ और ही कह रही थी |
बापू के तीखे तेवर और ऊँची आवाज़ ,
घर  के कोने- कोने को दहला रहे थे ,
बच्चे और अधिक अम्मा से सटे जा रहे थे |
अनपढ़ - अनगढ़ , सीधी - सादी माँ ,
मूक गाय सी आँसू बहा रही थी |

तुम सब सोर कम करो ,
तुमरे बापू कुछ परेसान हैं |
बापू की हर परेशानी का अम्मा क्यों है शिकार ,
गलती चाहे हो किसी की माँ पर ही क्यों होता है वार |
आखिर कब तक वह सहती रहेगी  यह अत्याचार  ?

न बिटिया हमका कोई दुख नहीं ,
यह तो मरद का काम ही है गरजना - बरसना ,
रोब -दाब , अहं यह सब है उनकी पहचान |
हमरे असून का , का है जे तो ज्यूँ ही बहे जाते हैं ,
तुमरे बापू दिन भर कहीं भई रहे ,
कम से कम साम को घर तो लौट आते हैं ,
हमरे जीने के लिए तो इत्ता ही बहुत है |
मुनिया टुकुर - टुकर अम्मा को निहार रही थी ,
क्या यही नियति मेरी भी होगी यही सोच रही थी |

तभी मुनुआ अम्मा से चिपट गया ,
तेरे लिए मैं बिजली का चूल्हा लाऊंगा,
अम्मा तेरा हर दुख अब मैं उठाऊंगा |
अम्मा ने प्यार भरी  चपत लगाई,
यह सब करना जब आए तेरी लुगाई |

मुनुआ अम्मा में और गद गया ,
मुनिया ने बजाई तली और बोली ,
मैं अपना चूल्हा खुद लाऊँगी ,
अपनी ऑंखें यूँ ही न व्यर्थ बहाउंगी |

अम्मा ने धैर्य से सर पर हाथ फेरा ,
हाँ , तेरा हर सपना जरुर पूरा करवाउंगी  |
अब बापू के विरोध से भी ,
मुनिया पढने जाती है ,
घर आ अम्मा को किस्से - कहानी सुनती है |

अम्मा अब भी ऑंखें रगडा करती है ,
अपनी नहीं , बापू की ऑंखें पौंछा करती है ,
खटिया पर पड़े बापू गों - गों करते हैं ,
उनकी आँखों से अविरल बहते आंसू मानो ,
अपराध बोध से ग्रस्त क्षमा याचना करते हैं |

मुनिया - मुनुआ कभी - कभी मिलने आते हैं ,
लाख चाहने पर भी अम्मा को  साथ नहीं ले जा पाते,
अम्मा बापू की सेवा में दिन -रात बिताती है ,
उसे ही अपने भाग्य  का लेखा मान कर तृप्त हो जाती हैं |

Friday, January 21, 2011

मिलने और बिछुड़ने के बीच

मिलने और बिछड़ने के बीच ,
ठहरा पल ,
रेंगता चाँद ,
झरती चांदनी ,
बहती रात ,
मदहोश नयन ,
अधमुंदी पलक ,
साकार स्वप्न ,
मखमली खनक ,
रेशमी तपिश ,
अस्फुट स्वर ,
संदली खुशबू ,
जादुई स्पर्श ,
अलौकिक अदेही   मिलन ................

भोलापन

बुधिया दौड़ती - दौड़ती भीतर आयी,
अम्मा का पल्लू खींच बोली ,
"जल्दी बाहर आओ ,
देखो उपरवाला ,हमसे भी ज्यादा गरीब है |"
अम्मा खिजाई, "छोरी काम का बखत है ,
तू अलाय  - बलाय बोल कर टेम ख़राब मत कर |"
बुधिया रूआंसी हो कर बोली ,
तू तो कहती थी ,
उपरवाला सबकी सुनता है ,
वही सबका मालिक है ,
वही सबको देता है ,
हमारी भी वही सुनेगा ,
पर उसका अपना कम्बल ,
कितने छेदों से भरा है |
अम्मा अवाक् उसका मूंह ताकने लगी ,
अरी पगली !  वह तो टिम टिमाते तारे हैं ,
उसकी मखमली चादर में जड़े सितारे हैं |
बुधिया तमतमाई ,तो हमारे सितारे को तुम ,
छप्पर में हुआ छेद क्यों कहती हो ?
उसने झोपडी के   कोने से छन कर आती,
चांदनी की तरफ अपनी ऊँगली घुमाई ,
दुधिया किरणों का प्रकाश ,
बुधिया के चेहरे को दमका रहा था ,
अम्मा रोटी सेंकना भूल ,
कभी बुधिया तो कभी छत को देखती ,
जो वाकई हीरे की तरह चमक रहा था |

Wednesday, January 19, 2011

अनजाना पर अपना देश

अनजाना पर अपना देश
इस अनजान देश ,
नगर , गली  में महफूज़ हूँ मैं |
इन अजनबी , अनदेखे ,
चेहेरो   के बीच सुरक्षित हूँ मैं |
ये सपाट - निस्तेज चेहेरे,
प्रशन नहीं पूछते ,
फिकरे नहीं कसते ,
स्वीकारते हैं मुझे ,
मेरे ही रूप में |
अपनों के बीच ,
तालमेल का झमेला है ,
रिश्तों की भीड़ ,
फिर भी मन अकेला है |
समझोते की दुनिया ,
हर वक़्त की खींचतानी,
देती है बस परेशानी |
इसलिए मैं
इस अनजान देश ,
नगर , गली  में खुश हूँ..........

Tuesday, January 18, 2011

thanda pradesh

सर्द सफ़ेद सन्नाटा ,
ठंडी बर्फ से लोग ,
न उमंग , न अहसास ,
शून्य में तकती निगाहें ,
कनटोपों में छिपे कान ,
क्षण भर को नजर का मिलना ,
कोरों पर मुस्कराहट का खिलाना ,
फिर वापस अपने केंद्र की ओर,
सब अपनी धुरी से बंधे ,
दूसरों के सुख - दुःख से परे ,
सर्द सफ़ेद सन्नाटा मानो जम गया है शिराओं में |
 
इतना बड़ा  बर्फीला  शहर ,
हजारों लोग , लाखों गाड़ियाँ ,
पर न कोई आवाज़ , न कोई शोर ,
न मंदिर की घंटी , न मस्जिद की अजान ,
न गुरबानी के बोल , न चर्च की प्रार्थना ,
यह नहीं  कि होता नहीं यह सब यहाँ ,
पर होता है कब यही हमको नहीं पता ,
बिना आवाज़ ही सब काम निबट जाते हैं ,
दूर दूर तक फैले लोग पल में सिमिट जाते हैं ,
सर्द सफ़ेद सन्नाटा जैसे हड्डियों में बस गया है ,
इसलिए इंसान यहाँ भावशून्य हो गया है |

Monday, January 17, 2011

surymukhi si mae

मैं सूर्य मुखी सी ,
अपेक्षा  से  वशीभूत ,
घूम जाती हूँ ,
तुम्हारी  ओर हर बार..........|
कभी सौम्य ,
कभी मद्धम ,
कभी प्रखर ,
तुम्हारी रोशनी...|
आकस्मिक तुम्हारी तब्दीली,
असमंजित करती है |
असंतुलित , अस्पष्ट ,उन्मादी ,
तुम्हारा आचरण ...|
सवांरता , मांजता ,परिपक्व
करता है मुझे भीतर से ..........
मैं ओर निखर जाती हूँ ,
पहले से अधिक ,
सजीव ,शोख ,दीप्तिमान ..........|

Saturday, January 15, 2011

Milan

समुंदर में गिरती नदी ,
क्षितिज   मे डूबता सूरज,
धूल में मिलती बूंद ,
अमिट प्यार का आलिंगन |
दो प्रेमी मन  का मिलन ,
मिट कर पाने की  ललक ,
खो कर पाने की चाह,
प्रेम का अदभुत आकर्षण ,
खड़ी देखती हूँ मैं...
संभव है ऐसा सिर्फ प्रकृति मे ,
मानव रह जाता है अछूता इतनी सच्चाई से ,
अपनी ही धुन मे जकड़ा ,
अपने अहम से अकड़ा ,
रह जाता है अपने ही अन्दर ,
इसलिए साथ रह कर भी अकेला ........