Saturday, January 29, 2011

तुम न समझे

तुम न समझे
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो  ,
तुम मुझे ..............|
मेरे सतरंगी ख्वाबों की हकीकत हो तुम ,
मेरे लरजते होठों की इबादत हो तुम ,
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो ,
तुम मुझे ...............|
मेरी झिलमिलाती कल्पना की सच्चाई हो तुम ,
मेरी अनकही कविता की गहराई हो तुम ,
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो ,
तुम मुझे ................|
मेरी हर करवट की सरसराहट हो तुम ,
मेरी अधसोई  रात की खुमारी हो तुम ,
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो ,
तुम मुझे ................|
मेरी अलसाई सुबह की अंगड़ाई हो तुम ,
मेरी बौराई शाम की मदहोशी हो तुम ,
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो ,
तुम मुझे ....................|
मेरी मदमस्त पलकों की शबनम हो तुम ,
मेरे गुम हुए दिल की धड़कन हो तुम ,
तुम कभी न समझे ,
कैसे छू गए हो ,
तुम मुझे ....................|

माँ तेरी जैसी

माँ तेरी जैसी
सब कहते हैं मैं तेरी तरह दिखती हूँ ,
तेरी तरह हँसती और रोती हूँ |
सुन कर गौरवान्वित हो जाती हूँ ,
पर माँ मेरी रोटी, तेरी तरह नहीं बनती ,
जैसी बनाती है तू ,नर्म - नर्म - गोल ,
पतली - करारी और ढेर सारा घी ,
मेरी रोटी वैसी क्यों नहीं बनती ......|
उबली दाल में वह हींग- जीरे का छौंक,
उसकी महक से ही भूख जाये लहक ,
माँ मेरी दाल से वह महक क्यों नहीं आती ...|
बासी रोटी की चूरी और खूब  सारी शक्कर ,
छाछ भरे ग्लास में तैरता ढेला भर मक्खन ,
माँ मेरी चूरी में शक्कर ठीक से क्यों  नहीं पड़ती ..|
टिफिन में परांठा और आम के आचार की फांक ,
जीभ को तुर्श कर जाये वह मीठी सी - खटास ,
माँ मेरी आचार की फांक में वह खटास क्यों नहीं आती ..|
स्टील के बड़े ग्लास में गर्म - गर्म  दूध की भाप ,
उस पर तैरती मोटी - गाढ़ी मलाई की परत ,
माँ मेरे दूध में वैसी  परत क्यों नहीं पड़ती ...|
जब मैं हूँ तेरी जैसी माँ......!
 तो मेरी रोटी तेरी जैसी क्यों नहीं बनती ...???

Wednesday, January 26, 2011

कोई तो जगह होगी

कोई तो जगह होगी ,
जहाँ चाँद और सूरज,
एक साथ मिलते होंगे |

जहाँ धूप और छाया ,
एक दूसरे में घुलते होंगे |

जहाँ सपने और हकीकत ,
एक साथ सजते होंगे |

जहाँ हँसी और दर्द ,
एक दूसरे पर मरते होंगे |

जहाँ अपने और पराये ,
एक साथ मिलकर हँसते होंगे |



क्या तुमने कभी महसूस किया है ?

क्या तुमने कभी महसूस किया है ,
भोर की सुनहरी धूप में,
कली का हौले से चट्खना ,
धीरे - धीरे पंखुरियों का खिल जाना |
क्या तुमने कभी महसूस किया है ,
घास पर लेटे- लेटे ,
आकाश में  स्याह -सफ़ेद बादलों में ,
हाथी- घोड़े आदि का बनाना |
क्या तुमने कभी महसूस किया है ,
खिली चटक चांदनी में ,
अधमुंदी- नशीली  पलकों पर,
हलके - नर्म  सपने सजाना |
क्या तुमने कभी महसूस किया है ,
पेड़ से सूखे- पीले  पत्ते का ,
हवा में  तिरते -तिरते ,
नजाकत से ज़मीन को छू जाना |
क्या तुमने कभी महसूस किया है................?

Tuesday, January 25, 2011

dhup sardiyo ki

नरम , मखमली ,
आंचल के कोने सी ,
लहरा जाती है सर्दियों की धूप |
नन्हें बालक की ,
मासूम हँसी सी ,
गुदगुदा जाती है सर्दियों की धूप |
रूमानी अहसास सी ,
हौले - हौले से ,
छू जाती है सर्दियों की धूप |
नयी नवेली वधू की ,
लजीली चितवन सी ,
रोमांचित कर जाती है सर्दियों की धूप |
प्रेमी की याद की ,
हल्की छुअन सी ,
सहरा जाती है सर्दियों की धूप |

Azadi ka jshan

आज़ादी फिर तुझे याद किया ,
तिरेंगे आज फिर तुझे सलाम किया |
हर ईमारत पर तुझे बुलंद किया ,
हर साल की तरह  फिर तेरा जशन मनाया |
तुझे एक कोने में रख बाद में भुलाया,
तुझमे ही लपेट कर एक -दूसरे को घूस खिलाया |
तेरे नाम की जपते - जपते माला ,
हमने तो अपना घर भर  डाला |
आज़ादी का मतलब खुल कर मांगों ,
खुल कर खायो और खिलायो |
गरीबी , बेकारी, भुखमरी अब  तेरी सहेली है ,
जी रहा कैसे इन्सान यह एक पहेली है |
हर कोई अधिकारों के नारे लगता है ,
फ़र्ज़ को जेब में रख कर भूल जाता है |
इंडिया shinning , incredible इंडिया ,
सिर्फ टी वी पर दिखाई  देते हैं |
आज भी मानव रोटी के लिए एक दूसरे  से ही लड़ जाता है |
पंचवर्षीय योजना द्रौपदी के चीर सी बड़ जाती है ,
पर विलासी दुर्योधन की भूख नहीं मिट पाती है |
भाषा ,प्रान्त ,धर्म सभी में कोई न कोई मनमुटाव है ,
बुत बना है देश , जिसका न कोई माज़ी न रहनुमार है |
सब बनाना चाहते  हैं  अपनी - अपनी अलग पहचान ,
कैसे गाऊँ मैं " मेरा भारत महान ....मेरा भारत महान ......"

Monday, January 24, 2011

dafan

सबके अपने - अपने सपने ,
सबके अपने अपने सच ,
सबकी अपनी - अपनी सीमाएँ,
सबकी अपनी - अपनी आकाक्षाएँ,
मर्यादा , सिद्धांतों , रिश्तों की कसौटी पर ,
सबका कुछ न कुछ दफ़न ...........