दिवाली के बाद का दिन कितना अच्छा होता है ,
सुबह - सवेरे निकल जाते हैं गली - मोहल्ले में ,
मिल जाते हैं कितने ही अधजले अनार ,पटाखे ,
स्याह - बुझी तीली से सटी कुछ फुलझड़ी ,
या कुछ अनफूटे - साबुत चकरी या बम ,
जूठन के ढेर में बची - खुची मिठाई ,
खील- बताशे , बर्फी या लड्डू एकाध ,
पार साल तो चली थी हवा बेशुमार ,
पा गए थे पूरा तेल और दिए अपार,
अम्मा ने भी तली थी पूरी- कचोरी और,
हमने जलाई थी रंग- बिरंगे दीपों की कतार,
खूब जम के होती है दिवाली हर बार ,
अपनी बस्ती भी करती है हुल्लड़ ,
दिवाली के बाद ..........हर बार ...............!!!!!