कच्ची - कच्ची उन पगडंडियों मे,
बादल जब खुल कर बरसता था ,
छोटे छोटे पोखरो का समा सा बंध जाता था ,
बच बच कर चलती मै,फिर भी बच न पाती थी ,
अक्सर कहीं न कहीं चप्पल मेरी फंस जाती ,
तुम पगली कह हल्की धौल जमाते थे ,
फिर मेरा रूआँसा मुख देख ,मंद-मंद मुसकाते थे ,
अब न कर रोने का नाटक झल्ली ,ले पकड़ मेरा हाथ ,
एक हाथ कंधे पे ,दूजा होता तुम्हारी मुट्ठी मे ,
हल्के से झटके से तुम मुझे बाहर खींच ले आते ,
बादल जब खुल कर बरसता था ,
छोटे छोटे पोखरो का समा सा बंध जाता था ,
बच बच कर चलती मै,फिर भी बच न पाती थी ,
अक्सर कहीं न कहीं चप्पल मेरी फंस जाती ,
तुम पगली कह हल्की धौल जमाते थे ,
फिर मेरा रूआँसा मुख देख ,मंद-मंद मुसकाते थे ,
अब न कर रोने का नाटक झल्ली ,ले पकड़ मेरा हाथ ,
एक हाथ कंधे पे ,दूजा होता तुम्हारी मुट्ठी मे ,
हल्के से झटके से तुम मुझे बाहर खींच ले आते ,
कीचड़ की वर्षा सी करती झटके से सीने से लग जाती थी ,
पल भर को ही सही बारिश का गुण मै गाती थी ,
जाने क्या हो जाता जन्नत मै पा जाती थी ,
चल अब चल पैर तू धो ले खींच पास के नल पे ले जाते ,
तुम यह न जाने कभी क्यों मेरा ही पैर अक्सर फँसता था ,
या शायद जान कर भी थे तुम बनते थे अनजान,
आज सड़क है पक्की ,न खुल कर बरसता है बादल ,
न लगती बुंदों की लड़ी ,न ही बनते है पोखर ,
होते भी तो क्या कर लेती ,तुम भो यहाँ नही साजन ....!
पल भर को ही सही बारिश का गुण मै गाती थी ,
जाने क्या हो जाता जन्नत मै पा जाती थी ,
चल अब चल पैर तू धो ले खींच पास के नल पे ले जाते ,
तुम यह न जाने कभी क्यों मेरा ही पैर अक्सर फँसता था ,
या शायद जान कर भी थे तुम बनते थे अनजान,
आज सड़क है पक्की ,न खुल कर बरसता है बादल ,
न लगती बुंदों की लड़ी ,न ही बनते है पोखर ,
होते भी तो क्या कर लेती ,तुम भो यहाँ नही साजन ....!