मैने तो यूं ही कहा ,
अल्लाह का मुझ पर कर्म हे,तू जो मेरे नसीब मे हे , तब से आज तक हम ,कभी माथे ,तो कभी हाथों की लकीर ढूंढते हे ,वाह रे खुदा ये तेरी कैसी खुदाई ,हमने , खुद को खुद की नज़र लगाई .Monday, July 22, 2013
Monday, July 15, 2013
बेटी के जन्मदिन पर
प्यारी मानसी ,
आज से ठीक इक्कीस वर्ष पूर्व तुमने हमारे जीवन को महकाया था ,
तुम्हारे आने की खुशी मे घर का हर सदस्य हर्षाया था ,
याद है आज भी मुझे वह तेरा पहला दीदार ,
मूँदीं पलकें , बंधी मुट्ठी ,लंबी अलकें,
उजला चाँद सा रूप , चाँदनी सी मुस्कान ,
तेरे पहले क्रंदन मे भी थी एक मिठास ,
आज पूरे इक्कीस वर्ष की नन्ही सी मेरी जान ,
जीवन के इस मोड पर मेरी बस यही दुआ ,
मिले हर सुख जीवन मे न टूटे कोई अरमान ,
जादू की कोई छड़ी तो नहीं मेरे पास ,
जिसे फिरा तेरे सिर हर लूँ हर संताप ,
मेरा मान है तू , मेरा अभिमान है तू ,
तेरे भीतर बसे मेरे प्राण ..... !!
शुभ आशीष
माँ
आज से ठीक इक्कीस वर्ष पूर्व तुमने हमारे जीवन को महकाया था ,
तुम्हारे आने की खुशी मे घर का हर सदस्य हर्षाया था ,
याद है आज भी मुझे वह तेरा पहला दीदार ,
मूँदीं पलकें , बंधी मुट्ठी ,लंबी अलकें,
उजला चाँद सा रूप , चाँदनी सी मुस्कान ,
तेरे पहले क्रंदन मे भी थी एक मिठास ,
आज पूरे इक्कीस वर्ष की नन्ही सी मेरी जान ,
जीवन के इस मोड पर मेरी बस यही दुआ ,
मिले हर सुख जीवन मे न टूटे कोई अरमान ,
जादू की कोई छड़ी तो नहीं मेरे पास ,
जिसे फिरा तेरे सिर हर लूँ हर संताप ,
मेरा मान है तू , मेरा अभिमान है तू ,
तेरे भीतर बसे मेरे प्राण ..... !!
शुभ आशीष
माँ
Friday, July 12, 2013
काश रोक लेती उस पल को
यूं ही चलते - चलते ,
यकायक उंगलिया टकरा गई ,
सनसनासन बिजली सी कौंध गई .....
सकपका कर छिटक गए ,
तुम यूं ही बादलों को घूरने लगे ,
मै बिनमतलब लट सँवारने लगी ......
उस दिन सिर मे दर्द था शायद ,
तुमने कहा सहला दूँ ,
सकुचती सी हल्की सी हामी ,
तुम्हारा वह कुनकुना स्पर्श,
पिघलने लगी , जा पहुंची दूर ,
जहाँ सिर्फ मै और तुम ,
न कोई हैरानी न ही परेशानी ,
न जात न पात न ही आटे -दाल का भाव ,
कब तक यूं ही दिवास्वप्न मे रही डूबी ,
धीमी सी चपत मेरे गाल पर ,
सो गई क्या पगली ....
सकपका , नहीं नहीं बस यूं ही ,
काश ... तुम बस मेरे होते ,
काश ये रिश्ते यूं न उलझे होते ,
तभी गंभीर तुम्हारा स्वर ,
याद है न कल मुझे जाना है ,
नई नौकरी का पहला दिन ,
नई जगह ,नए लोग , तुम तुम
बहुत याद आओगी ?
क्या , मै भी तुम्हें याद आऊँगा ?
टपटपाती दो जोड़ी आंखे,
ओर ठहरा - ठहरा सा समय ,
काश रोक लेती उस पल को ,
बांध लेती तुम्हें तो आज ,
वही उसी मोड पर न लगी होती ये निगाहें ...
न जाने कब से
जमी है .....वहीं की वहीं .....
यकायक उंगलिया टकरा गई ,
सनसनासन बिजली सी कौंध गई .....
सकपका कर छिटक गए ,
तुम यूं ही बादलों को घूरने लगे ,
मै बिनमतलब लट सँवारने लगी ......
उस दिन सिर मे दर्द था शायद ,
तुमने कहा सहला दूँ ,
सकुचती सी हल्की सी हामी ,
तुम्हारा वह कुनकुना स्पर्श,
पिघलने लगी , जा पहुंची दूर ,
जहाँ सिर्फ मै और तुम ,
न कोई हैरानी न ही परेशानी ,
न जात न पात न ही आटे -दाल का भाव ,
कब तक यूं ही दिवास्वप्न मे रही डूबी ,
धीमी सी चपत मेरे गाल पर ,
सो गई क्या पगली ....
सकपका , नहीं नहीं बस यूं ही ,
काश ... तुम बस मेरे होते ,
काश ये रिश्ते यूं न उलझे होते ,
तभी गंभीर तुम्हारा स्वर ,
याद है न कल मुझे जाना है ,
नई नौकरी का पहला दिन ,
नई जगह ,नए लोग , तुम तुम
बहुत याद आओगी ?
क्या , मै भी तुम्हें याद आऊँगा ?
टपटपाती दो जोड़ी आंखे,
ओर ठहरा - ठहरा सा समय ,
काश रोक लेती उस पल को ,
बांध लेती तुम्हें तो आज ,
वही उसी मोड पर न लगी होती ये निगाहें ...
न जाने कब से
जमी है .....वहीं की वहीं .....
Wednesday, July 10, 2013
कर गयी प्रस्थान ..
गांठ सी थी ..
गुम अपने में मग्न
या नदी सी --कलकल ... थी ,
पहेली सी - अनबुझ ...
जब तक थी महफ़िल में बातों का कारण थी
और मरकर भी ..........!!
न कोई मशहूर हस्ती थी न ही कोई नामचिनी खानदान ..
कमबख्त ऐसी ही थी .......
जीते जी लोंगो की जुबान पे कसैली या रसीली ..
तुर्श.......इश श श श ....चटपटी ..मजेदार .. ...
मर कर भी ..खट्टी - मीठी ....
पहली धार सी .....तीखी ...सीधे सर चढ़ कर बोले ।
आजाद ......बिन डोर पतंग .....समाज के सागर मे बिन पतवार की नैय्या .
डूबती -तैरती -उबरती -
हिचकोले -लेती ....मनमौजी लहरों पे .
आवारा - किरण सी सवार ।
बोलती कम ,हँसती ज़्यादा थी -----
धूप में मनो अभ्रक छिडकती थी !!!!
उसकी यही बेफिक्री
कईयों को खल गयी ,
भला यह भी कोई ,
जीने का अंदाज़ है ,
न चिंता - न फिकर ,
न लाज - न हया ,
न छोटो का लिहाज़ ,
न बड़ों की शर्म
उसने किया नगाड़ा बजा एक अलग ही ऐलान --------
अब सिर्फ सुनेगी,
अपने मन की .....
अब सिर्फ करेगी ,
अपने मन की ..................
और फिर .....वह उड़ने लगी ...बहने लगी..
धरती से आकाश की और ..
झंझावातों - धूलि--धूसरित बादलों से परे ....
दूर आकाश की ओर
बिजली के प्रहार से बेपरवाह ...निडर ...मजबूत ..मस्त..
....उडती ...ऊँचे ही ऊँचे ....कर गयी प्रस्थान ..
गुम अपने में मग्न
या नदी सी --कलकल ... थी ,
पहेली सी - अनबुझ ...
जब तक थी महफ़िल में बातों का कारण थी
और मरकर भी ..........!!
न कोई मशहूर हस्ती थी न ही कोई नामचिनी खानदान ..
कमबख्त ऐसी ही थी .......
जीते जी लोंगो की जुबान पे कसैली या रसीली ..
तुर्श.......इश श श श ....चटपटी ..मजेदार .. ...
मर कर भी ..खट्टी - मीठी ....
पहली धार सी .....तीखी ...सीधे सर चढ़ कर बोले ।
आजाद ......बिन डोर पतंग .....समाज के सागर मे बिन पतवार की नैय्या .
डूबती -तैरती -उबरती -
हिचकोले -लेती ....मनमौजी लहरों पे .
आवारा - किरण सी सवार ।
बोलती कम ,हँसती ज़्यादा थी -----
धूप में मनो अभ्रक छिडकती थी !!!!
उसकी यही बेफिक्री
कईयों को खल गयी ,
भला यह भी कोई ,
जीने का अंदाज़ है ,
न चिंता - न फिकर ,
न लाज - न हया ,
न छोटो का लिहाज़ ,
न बड़ों की शर्म
उसने किया नगाड़ा बजा एक अलग ही ऐलान --------
अब सिर्फ सुनेगी,
अपने मन की .....
अब सिर्फ करेगी ,
अपने मन की ..................
और फिर .....वह उड़ने लगी ...बहने लगी..
धरती से आकाश की और ..
झंझावातों - धूलि--धूसरित बादलों से परे ....
दूर आकाश की ओर
बिजली के प्रहार से बेपरवाह ...निडर ...मजबूत ..मस्त..
....उडती ...ऊँचे ही ऊँचे ....कर गयी प्रस्थान ..
Saturday, July 6, 2013
स्मृति का खज़ाना
दिल के परदों मे जो बंद है,
स्मृति का खज़ाना .......
मेरा है सिर्फ मेरा .....
माफ करो नहीं बाँट सकती ,
खुदगर्ज़ ...स्वार्थी या मतलबी ,
जो भी कहो ...कुछ भी कहो ,
फरवरी की धूप सा .....
हल्का .... सौंधा ...कुनकुना ...
लपेट लेता है मुझे ,
तेरी बाहों की गर्माहट सा........
स्मृति का खज़ाना .......
मेरा है सिर्फ मेरा .....
माफ करो नहीं बाँट सकती ,
खुदगर्ज़ ...स्वार्थी या मतलबी ,
जो भी कहो ...कुछ भी कहो ,
फरवरी की धूप सा .....
हल्का .... सौंधा ...कुनकुना ...
लपेट लेता है मुझे ,
तेरी बाहों की गर्माहट सा........
Thursday, July 4, 2013
.सबसे जुड़ी मै
वह भी मेरा हिस्सा है,
मै भी उसका किस्सा हूँ ,
जब जब होता है किसी पे वार ,
दामन मेरा भी छीज जाता है .....
वह लुटती है गली - गलियारों मे ,
घर का आँगन मुझे लील जाता है ,
उसकी अस्मत की हर चोट ,
मेरे सीने को करती लहूलुहान ,
माना कि मै वो नहीं पर उससे जुदा भी नहीं ,
जुड़ी हूँ तेरे से मानो तेरा ही पुर्ज़ा हूँ ,
तेरे आँसू मेरी आँखों से बरसते है ,
तेरा दर्द मेरी आहों को गहराता है ,
खंडित होती गर तू , बिखर मै भी जाती हूँ ,
नारी हूँ ..... आग हूँ ....पानी हूँ....
शक्ति हूँ ...मर्यादा हूँ .....धरा हूँ ...अवनी ...भू ....हूँ ...सबसे जुड़ी मै ............!!!
मै भी उसका किस्सा हूँ ,
जब जब होता है किसी पे वार ,
दामन मेरा भी छीज जाता है .....
वह लुटती है गली - गलियारों मे ,
घर का आँगन मुझे लील जाता है ,
उसकी अस्मत की हर चोट ,
मेरे सीने को करती लहूलुहान ,
माना कि मै वो नहीं पर उससे जुदा भी नहीं ,
जुड़ी हूँ तेरे से मानो तेरा ही पुर्ज़ा हूँ ,
तेरे आँसू मेरी आँखों से बरसते है ,
तेरा दर्द मेरी आहों को गहराता है ,
खंडित होती गर तू , बिखर मै भी जाती हूँ ,
नारी हूँ ..... आग हूँ ....पानी हूँ....
शक्ति हूँ ...मर्यादा हूँ .....धरा हूँ ...अवनी ...भू ....हूँ ...सबसे जुड़ी मै ............!!!
Thursday, June 27, 2013
मजनू दीवाना..
कल रात अलगनी पर लटकते चाँद को ,
गिरने से बचा लिया उसने ,
हौले से उठा हाथों मे ,
उछाल दिया आसमां मे,
चाँद बन गया आशिक उसका ,
उसकी याद मे घटने लगा ,
पर जब देखी छाप उसकी ,
जिस्म पर अपने इठला के ,
बढ़ने लगा ......
कहते है तब से ,
याद मे उसकी घटता औ बढ़ता है ,मजनू दीवाना..
गिरने से बचा लिया उसने ,
हौले से उठा हाथों मे ,
उछाल दिया आसमां मे,
चाँद बन गया आशिक उसका ,
उसकी याद मे घटने लगा ,
पर जब देखी छाप उसकी ,
जिस्म पर अपने इठला के ,
बढ़ने लगा ......
कहते है तब से ,
याद मे उसकी घटता औ बढ़ता है ,मजनू दीवाना..
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