Sunday, February 5, 2012

सखी आया बसंत ,


सखी आया बसंत ,
गुलमोहर खिल गए |

अधखुली पलकों में ,
फिर नए सपने पल गए |
 मन के आँगन में ,
प्रेम की छाया तले..
आशा के झूले पड़ गए |

सखी आया बसंत ,
गुलमोहर खिल गए |

फूला गेंदा , महका चमन |
पाती-पाती , हीरक -माणिक |
महके , मधुर , पीत पराग कण  |
सयंम की डोरी तोड़ के ,
ह्रदय हिरन कुलाँचे भर गए |

सखी आया बसंत ,
गुलमोहर खिल गए |

हरित -धरती , नील - गगन |
ओस बूंदों से चमचम उपवन |
झरते झरने कल - कल |
रस्मों के  बंधन तोड़ कर  ,
प्रेमी युगल मिल गए |

सखी आया बसंत ,
गुलमोहर खिल गए |

10 comments:

  1. बसंती बयार....सुन्दर रचना....सुन्दर तस्वीर |

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  2. बहुत बढ़िया वासंती कविता...

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  3. वाह रे बसंत .....अपनी सखी को बसंत के बारे में बताने का अंदाज निराला है ....!

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  4. लाजवाब बसंती रचना ... बहुत ही अच्छी ...

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  5. खिली खिली सी सुवासित रचना...
    बधाई..

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  6. बहुत प्यारी रचना.

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