Wednesday, September 5, 2012

" आज का अभिमन्यु

 मुँह अंधेरे उठ ,
बसी रोटी पानी से गटक ,
चल हो लोकल मे सवार,
लटक पायदान से ,
बच सिग्नल से ,
कूद अपने गंतव्य पे ,
भाग पहुँच सेठ के ,
दिन भर खून बहा ,
दिन ढले फिर भाग, पकड़ लोकल ,
रास्ते मे बनिए की दुकान का हिसाब ,
भर बची-खुची बासी तरकारी ,
पीली पड़ी पत्नी को ,
पकड़ा पैबन्द लगा थैला,
सुन दो -चार अर्थहीन बातें ,
दे तीन - चार तू भी घूंसे - लात,
मुन्ने - मुन्नी को झिड़क ,
खोल देसी और उतार दिनभर ,
की अपनी झींक .....
देख शेखचिल्ली से ख्वाब ,
बना हवा मे महल ,
डुबो के मोटी रोटी ,
पनीली- फीकी सी दाल मे ,
झूलती खटिया पे ,
ओढ़ थेगली, बुन नींद ,
कल, फिर से कर शुरू ,
वही सब जो किया था आज ,
जीवन की महाभारत मे ,
दिनभर के चक्र का ---- " आज का अभिमन्यु" है तू ....

5 comments:

  1. बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति,,,,
    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  2. जाने कितने अभिमन्यु

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  3. बेहतरीन, लाजवाब.....बहुत ही सुन्दर.....हैट्स ऑफ इसके लिए।

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  4. हर स्तर पर कई अभिमन्यु हैं। समर जिनका रहता शेष है। मर कर अमर ये अभिमन्यु होते हैं या नहीं..पता नहीं। अच्छी कविता

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  5. यही यंत्रण है आज के अभिमन्यु की ....
    रोज ही संघर्ष करते है कितने ही अभिमन्यु ...

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