Tuesday, October 16, 2012

' तू' नर्क द्वार ..

जब मन चाहे तो , बोटी सा है चूमता ,
मन किया तो ,बोटी - बोटी है नोंचता ,
जब हो खुन्नस किसी की ,
करता है बोटी - बोटी अलग ,
मिल जाए तो चटखारता ,
इधर -उधर ,गाहे - बाहे,
दिदे फाड़ है लीलता ,
फिर कहता है फिरता ,
' तू' नर्क द्वार ..... 
वाह ,अजब तेरे नखरे ,

गजब का रुबाब ,
चूस माँस- मज्जा ,
बोटी की तरह है फेंकता .... ॥

11 comments:

  1. हम्म्म्म....
    आक्रोश झलक रहा है....जायज़ है.

    अनु

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  2. निशब्द करती रचना

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  3. भावमयी अभिव्यक्ति...

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  4. सटीक कटाक्ष....

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  5. निःशब्द अद्भुत सटीक कटाक्ष

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  6. आपके पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा। कविता भी अच्छी लगी। मुझे अभिप्रेरित करने के लिए आपका आभार ।

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