Monday, March 12, 2012

कलाकार

वह एक कलाकार की भांति चित्र बनती है ,
रंग - तुलिका और कागज की बजाय ,
जनता के समक्ष खुद को सजाती है 
कुछ मित्रों के मध्य ,बिन बात मुस्कराती है ,
उसकी स्मित रेखा ज़्यादा ही खिच जाती है 
दो - चार लोगो के बीच, गंभीर हो जाती है ,
हल्के से सिर हिला दुनिया की चर्चा कर जाती है 
अन्य परिजनों के बीच शर्मीली -शांत मूक रह जाती है ,
उसकी मौजूदगी ही वहां से नज़रंदाज़ हो जाती है 
लोकप्रिय होना चाहती है ,घुल - मिल जाना चाहती है 
समान बनाना चाहती है ,साबित करना चाहती है 
उसे देख सब उसकी तरह ही बनाना चाहती है 
कितना अपनापन ,सामंजस्य और उन्मुक्तता ,
पर अक्सर एकांत मे वह अपने से ही करती है, 
एक सवाल बार - बार ....
कौन हूँ मैं.....मैं हूँ कौन ??????

29 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,भावपूर्ण सुंदर रचना,...पूनम जी,..बधाई

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  2. बहुत खूब ... अपने आप से संवाद अच्छा लगा बहुत ही ...

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  3. भावप्रवण कविता के लिए बधाई स्वीकार करें।

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  4. वार्तालाप....खुद का खुद से....!!
    सुन्दर......!!!

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति, सुंदर रचना,...

    RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

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  6. यह प्रश्न सालता है हमेशा...कौन हूँ मैं...उम्दा!!

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  7. bahut sunder rachna.....ekant me sab khud ko hi khojte hai....badhiya prastuti....mere blog par aapka swagat hai

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    1. dhnyawad , zarur apka blog padungi

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  8. पूनम जी
    नमस्कार !
    ...बेहतरीन रचना गहरी अभिव्‍यक्ति।
    जरूरी कार्यो के ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ

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  9. सुन्दर प्रस्तुति !
    आभार !

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  10. यह तो यक्ष प्रश्न है...
    मैं हूँ कौन???मैं ही नहीं जानता...

    बहुत सुन्दर रचना...

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  11. बहुत ही बेहतरीन रचना....

    मेरे ब्लॉग
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  12. dhnyawad, zarur apke blog par aaungi

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  13. शाश्वत प्रश्न, शाश्वत समस्या, अच्छी कविता!

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