Saturday, July 7, 2012

पानी की बूंदे





सुबह - सुबह पत्तों से टपकती - पानी की बूंदे ,
क्या बरसी थी चांदनी ?
या इसके साये तले,
जड़ों सी चिपकी ,
वो देखो मासूम - 
नन्ही- सी  जान ,
रात भर - घुटनों को मोड़े ,
पेट को भींचे ,
सांस को खींचे ,
सुबक - सुबक ,
अनमनी - सी ,
भूखी थी सोयी ,
रात भर --- फूट - फूट पाती भी रोई .....!!

16 comments:

  1. वाह..
    बहुत सुन्दर...
    कोमल सी अभिव्यक्ति.....

    अनु

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  2. बहुत ही खुबसूरत...

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  3. वाह,,,,,, बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  4. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ती .... !!

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  5. अभिनव दृष्टी और सोच. सच्चाई के भी बेहद करीब.

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    1. बहुत सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , बधाई .

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  6. बहुत ही खुबसूरत सी पोस्ट।

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