Friday, July 13, 2012

उँगलियों का संवाद

क्या तुम्हें आंखो की भाषा समझ आती है॥? 
नहीं !!!!!
अच्छा तो क्या तुम पढ़ पाते हो मौन के शब्द... ?
नहीं .....!!!
उफ़्फ़ , तो क्या उँगलियों का संवाद ...????
नहीं ...!!!!!!
लो थामो हाथों में मेरा हाथ ,
देखो यह जो दरार है इन उँगलियों के दरमियान ,
ताकि तुम फंसा सको इनमे अपनी उँगलियाँ ......
एकरस हो जाए हो जाए दोनों इन की तरह ,
खत्म हो लकीर जहाँ मेरी ,शुरू हो तेरी वहाँ से,
मिट जाए फर्क तेरी -मेरी लकीरों का............!!!!!!!


18 comments:

  1. एक सी हों दोनों की लकीरें...दोनों की तकदीर...
    पायें दोनों एक दूजे को....

    अनु

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  2. उगलियों को यू फसां,मिटा डाल लकीर,
    एकरस हो जाओ तो, बन जाये तकदीर,,,,

    RECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...

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  3. हर किसी की ऐसी नेक कोशिशें शायद किसी वक्त ये फर्क मिटा पाएं...खूबसूरत

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  4. उलझती उँगलियाँ सुलझती पहेलियाँ

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  5. बेहद सशक्‍त ... भाव

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  6. हाथों का स्पर्श और मौन की भाषा .......वाह उतम ...बहुत खूब

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  7. shabdon khamoshi main tairte rahe
    shabdon ki khamoshi dil main utar gayee
    shabdon aur khamoshi main faasla kuch itna tha
    ki unmein mujhe koi fark maloom na hua.

    Keep them coming Poonam.

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