Wednesday, April 3, 2013

आज भी बिछी है वहीं की वहीं

कमरे की रेतीली दीवार से खा रगड़ ,
वह औरत छीलती रही पल - पल ,
नर्म प्यार के अहसास फूट गए फफोले से ,
बह चल पीला - मवाद मर्यादा का ,
रेंगने लगा बदन पर बोझ समाज का ,
कहाँ रहा फिर अपना मन अपना ,
बंट गया , खंडित -खंडित हिस्सों मे ,
इतनी ढेर सी कीरेंचे की बटोर भी न पाई ,
और भी ज़्यादा बिखरती चली गई , 
न समाई धरती मे न ही डूब सकी ,
धूल सी उड़ छा गई तेरे वजूद पे ,
कितना भी पोंछों फिर भी चमकती है,
मेज़ - कुर्सी तुम्हारी तिपाई पे ,
नहीं छोड़ सकी मोह तेरे आँगन का ,
आज भी बिछी है वहीं की वहीं ॥

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर!!!

    अनु

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  2. बहुत सुंदर रचना,,,,

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  3. औरत जीवन की संवेदनशीलता को बेहतरीन तरीके से रक्खा है आपने ....

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  4. बहुत सुंदर रचना

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  5. अपने घर का घाव एक औरत ढोए चलती है ...

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  6. नहीं छोड़ सकी मोह तेरे आँगन का ,
    आज भी बिछी है वहीं की वहीं ॥

    भारतीयता की छबि

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  7. pehli baar aana hua aapke blog par..aur padhke ye laga pehle kyun nahin aaye....sashakt rachna...Bharteeyta aur sanskritiki aad men mil raha naari ka dar bahut bakhoobi bayaan kiya hai....samay aa chuka hai ki naari ke tyaag ki prasansha ki jaaye..ya fir use aur tyaag karne par majboor n kiya jaaye...vichaarneey rachna

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  8. गहन अनुभूति
    भावपूर्ण सुंदर रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति



    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

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