Monday, May 6, 2013

न स्त्री न ही पुरुष

छक्का ...
हिजड़ा ....
हा हा ...ही..... ही .... 
नहीं कोई पहचान ,
न ही कोई मान ,
बस हंसने - हँसाने का सामान॥ 
न स्त्री न ही पुरुष ,
दोनों का ही समावेश ,
इसलिए हँसी का पात्र॥ 
गाना - बजाना - नाचना ,
अपना दर्द छिपा --- हाय - हाय कहना ,
काम नहीं मजबूरी है मेरी ,
अब तुम्हें भी यही सुनने की आदत जो है मेरी ॥

11 comments:

  1. आज की ब्लॉग बुलेटिन ' जन गण मन ' के रचयिता को नमन - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सही कहा...

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  3. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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  4. प्राकृति के मारे या इंसानी रूप में हैवाने के मारे लोगों के दर्द को उकेरा है इन पंक्तियों में ...

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  5. बहुत सुन्दर और गहन..........कसक सी उठाती रचना।

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