Thursday, August 8, 2013

याद है न

याद है न , 
जहाँ खड़े थे तुम ,
पत्तियों से झाँकता ,
बेशर्म सूरज तुम्हें ,
गलबहियाँ ले रहा था , 
हल्के परेशान तो थे ,
पर जमे रहे उसी कोने से ,
क्यों नहीं बड़े आगे ?
क्या होता ,शायद कुछ ,
हम - तुम करीब हो जाते ,
अड़ियल - टट्टू हो न ,
"मै" मे अड़े के अड़े ,
आज भी है कोना वही ,
बस एक तुम नहीं ,
सूरज भी नहीं करता अब कोई मनमानी ....

8 comments:

  1. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

    ReplyDelete
  2. आज भी है कोना वही ,
    बस एक तुम नहीं ,
    सूरज भी नहीं करता अब कोई मनमानी ....
    Very touching!

    ReplyDelete
  3. हम भूल गए हैं रख के कहीं …


    http://bulletinofblog.blogspot.in/2013/08/blog-post_10.html

    ReplyDelete