Tuesday, July 29, 2014

काश !सीख पती तुम्हें भूल पाना.....

आंसुओं की बारिशों से भीगी रातों में,
आधे खुले दरवाज़े से आती हुई रौशनी ,
हल्के अँधेरे और उजालों की छुटपुट आहटों के बीच लगा कि कोई आया है.....
बिखरता रहा उजड़े ख़्वाबों का चूरा,
लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं,
समय की धूल से भरे तकिये पर सर रखे,
न भूल पाने की बेबसी में..
दीवार... दरवाजें.....शहर और वीराना..
लौट आना बिस्तर पर...
काश !सीख पती तुम्हें भूल पाना...........

6 comments:

  1. भूलने के बहाने याद आना। य़ह भी अवश्यम्भावी हैं। सुन्दर कविता :)

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 31/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  3. कहाँ आसान होता है यादों को काट फैंकना हर शे से ... उनको भूल पाना आसानी से ...

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  4. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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