Tuesday, March 20, 2012

कल रात

कल रात खिड़की पर ,
 टंगे चाँद को देख मैंने पूछा....
उस पार क्या कोई मुझे याद करता है ?
चाँद मुस्कराया ......
कल रात बक्सा खंगालती माँ ,
तेरी गुड़िया सहला रही थी |
उसकी आँखों की नमी ,
एक कहानी सुना रही थी |
सुन कर सिहर गई मै,
इसलिए , क्या कल मै ,
ब़ार - ब़ार अपनी बिटिया को 
निहार रही थी  ? ?...........

इति ........ 

6 comments:

  1. सुभानाल्लाह बहुत खुबसूरत लगी नज़्म ।

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  2. दिल पर असर करती रचना ..

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  3. सुन्दर रचना दिल को छूती है।

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