Monday, August 6, 2012


अम्मा का बहाना

माँ बार - बार ऑंखें रगड़ रही थीं ,
"आज लकड़ी बहुत गीली है ,"
खिसयानी हँसी कुछ और ही कह रही थी |
बापू के तीखे तेवर और ऊँची आवाज़ ,
घर  के कोने- कोने को दहला रहे थे ,
बच्चे और अधिक अम्मा से सटे जा रहे थे |
अनपढ़ - अनगढ़ , सीधी - सादी माँ ,
मूक गाय सी आँसू बहा रही थी |

तुम सब सोर कम करो ,
तुमरे बापू कुछ परेसान हैं |
बापू की हर परेशानी का अम्मा क्यों है शिकार ,
गलती चाहे हो किसी की माँ पर ही क्यों होता है वार |
आखिर कब तक वह सहती रहेगी  यह अत्याचार  ?

न बिटिया हमका कोई दुख नहीं ,
यह तो मरद का काम ही है गरजना - बरसना ,
रोब -दाब , अहं यह सब है उनकी पहचान |
हमरे असून का , का है जे तो ज्यूँ ही बहे जाते हैं ,
तुमरे बापू दिन भर कही भी  रहे ,
कम से कम साम को घर तो लौट आते हैं ,
हमरे जीने के लिए तो इत्ता ही बहुत है |
मुनिया टुकुर - टुकर अम्मा को निहार रही थी ,
क्या यही नियति मेरी भी होगी यही सोच रही थी |

तभी मुनुआ  अम्मा से चिपट गया ,
तेरे लिए मैं बिजली का चूल्हा लाऊंगा,
अम्मा तेरा हर दुख अब मैं उठाऊंगा |
अम्मा ने प्यार भरी  चपत लगाई,
यह सब करना जब आए तेरी लुगाई |

मुनुआ अम्मा में और गढ़  गया ,
मुनिया ने बजाई ताली  और बोली ,
मैं अपना चूल्हा खुद लाऊँगी ,
अपनी ऑंखें यूँ ही न व्यर्थ बहाउंगी |

अम्मा ने धैर्य से सर पर हाथ फेरा ,
हाँ , तेरा हर सपना जरुर पूरा करवाउंगी  |
अब बापू के विरोध से भी ,
मुनिया पढने जाती है ,
घर आ अम्मा को किस्से - कहानी सुनती है |

अम्मा अब भी ऑंखें रगडा करती है ,
अपनी नहीं , बापू की ऑंखें पौंछा करती है ,
खटिया पर पड़े बापू गों - गों करते हैं ,
उनकी आँखों से अविरल बहते आंसू मानो ,
अपराध बोध से ग्रस्त क्षमा याचना करते हैं |

मुनिया - मुनुआ कभी - कभी मिलने आते हैं ,
लाख चाहने पर भी अम्मा को  साथ नहीं ले जा पाते,
अम्मा बापू की सेवा में दिन -रात बिताती है ,
उसे ही अपने भाग्य  का लेखा मान कर तृप्त हो जाती हैं |

8 comments:

  1. अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी!!!!!
    जाने कौन सी माटी की बनी होती हैं ये औरतें/पत्नियाँ/माएं...
    गहन रचना...

    अनु

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  2. behtreen...... bahut sundar ....... bhartiya nari ka 100% sach

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  3. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.


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  4. वाह बहुत बेहतरीन सराहनीय सुंदर रचना,,,,बधाई पूनम जी,,,,

    RECENT POST...: जिन्दगी,,,,

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  5. sach me stri ka jeevan hamesha bhagya bharose chalta rahta hai

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  6. मुनिया - मुनुआ कभी - कभी मिलने आते हैं ,
    लाख चाहने पर भी अम्मा को साथ नहीं ले जा पाते,
    अम्मा बापू की सेवा में दिन -रात बिताती है ,
    उसे ही अपने भाग्य का लेखा मान कर तृप्त हो जाती हैं |

    जीवन का सार .फिर भी यही बहुतों का संसार

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  7. यह कविता कितने तरह के प्रेम को अपने में समाहित कर रही है.. बिलकुल छू गयी यह कविता दिल को.. बहुत खूब!

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  8. बेहतरीन और शानदार गज़ब के भाव है.....हैट्स ऑफ इसके लिए....आज की फेसबुक वाली रचना भी डालिए ब्लॉग पर ।

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