Wednesday, July 21, 2010

yaad

याद है ...
चलते - चलते ...
हम दोनों ...
एक साथ ,
कितने मोड़ , मुड़ जाते थे,
बेमतलब , बेपरवाह ...
चलते - चले जाते थे ...|
मै आज भी उस मोड़ पर खड़ी हूँ ,
तुम प्रिय बहुत दूर निकल गए .............

Tuesday, July 13, 2010

beti ki pukaar

मत मार , मत मार , माँ मुझे मत मार ,
मैं तो  हूँ तेरा ही प्राण ,
फिर तू कैसे हो गयी इतनी कठोर , निष्प्राण ?

तुझे मार कर , कर रही हूँ  अपना और तेरा उद्धार ,
आज भी इस समाज में तेरा जीना है दुष्वार |
आज भी तेरे लिए है अग्नि परीक्षा ,
आज भी भरी सभा में है अपमान ,
किसी का कलंक तेरे लिए है श्राप |

पर जो यह सब नारे हैं -----
"बेटी कुदरत का उपहार है , न करो इसका तिरस्कार  "

यह सब बेमानी हैं , अखबारों और पत्रिका में छापे जाते  हैं ,
गावों- शहरों की दीवारों पर लिपे जाते हैं |
नेताओं के मुहं से बोले जाते हैं |
सच तो यह है ----

आज भी तू कोड़ियों के दाम बिकती है ,
दहेज की बलिदेवी पर चढ़ती है ,
रंग - रूप के आधार  पर छनती है,
खुले आम बाज़ारों मे सजती है ,
बदले के लिए तू ही है सस्ता शिकार ,
इसलिए हर ब़ार तुझ पर ही होता है वार |

माँ हूँ तेरी , नहीं सह सकती यह अत्याचार ,
इसलिए आज तेरे उदगम स्थल पर ही  ,
करती हूँ मैं तेरा बहिष्कार ||

इति ............

Wednesday, July 7, 2010

uchaai

वह ऊँचा पहाड़ , नंगा खड़ा था |
गर्व से उसका माथा चड़ा था |
न पेड़ , न पौधे , न ही घास थी वहाँ |
पहुँचे अनेक , पर रुके  नहीं वहाँ |
सबसे अलग महान और एकाकी |
न चिड़िया - पंछी न हवा थी बाकी |
चेहेरे पर मुस्कान दिल मे दर्द छिपाए  |
रंगों - संगो को वह है  तरसता रहे |
यही है इतना  ऊँचे होने की मज़बूरी  |
जो बड़ा देती है अपनों से दूरी  |
इसलिए मै अपने आमपन मे ही खुश हूँ |
भीड़ मे खोकर भी,  अपने आप मे  ख़ास हूँ |

इति ......

Monday, July 5, 2010

mujhe chaiye

मुझे चाहिये घर ,
बंद दीवारें नहीं |
मुझे चाहिये हंसी ,
गहनों की झंकार नहीं |
मुझे चाहिये समय ,
एक युग नहीं |
मुझे चाहिये खुला आकाश ,
पूरी कायनात नहीं |
मुझे चाहिये आँखों के जाम ,
पूरा मयखाना नहीं |
मुझे चाहिये एक साथी ,
रखवाला नहीं |
मुझे चाइए एक इन्सान ,
भगवान नहीं |

इति.............

Saturday, July 3, 2010

sapno ki duniyaa

वह छोटी सी चिड़िया ,
एकांत की तलाश में , दूर बहुत निकल गयी |
शीतल ताल ,
सुनहरा आकाश ,
ऊँचा पहाड़ ,
पाकर वही बस गयी |
आबादी का कोलाहल ,
रिश्ते का धूयाँ ,
यादों की मिट्टी,
को वह अब तरस गयी |
पलकों का गीलापन ,
होठों की हंसी ,
दिल की चाहत ,
सपनों की दुनिया बन गयी |

.........इति ...........

Sunday, June 27, 2010

aek cheraa

चाँद के चहेरे पर एक अक्स नज़र आता है ,
याद है जब एक साथ घंटो चाँद को निहारा करते थे ,
आज भी नज़र आती है तुम्हारी आंखे चाँद मे,
एक खामोश गर्माहट फैल जाती है चारो तरफ ,
उस गर्माहट की चादर लपेट ,
इंतजार करती हूँ अगली रात का |

इति .........

rishta

समपर्ण ..............
सम्पूर्ण समपर्ण ............
चाह कर भी नहीं हो पाता ,
विद्रोही मन मेरा ,
प्रशनों  की दीवार पर अटक जाता है ,
रिश्तों का यह ताना - बाना,
जितना सुलझाती हूँ ,
उतना ही  उलझता जाता है |

इति.........