सूखी वे पाँखुरियाँ,
आज भी ताज़ा हैं ,
पीले - मटमैले पन्नो में |
उलझी है लट,
आज भी माथे पे ,
छुई थी जो तूने बार -बार |
पलकों मे मोती ,
रखे हैं अभी तक ,
याद है उन लम्हों की |
दुपट्टे का कोना ,
अनछुआ , अनधुला है ,
फेरा था चहेरे पर जिसे |
चिंदी -चिंदी वह टिकेट ,
बटुए के कोने मे है दबा ,
साथ बिताये पलों की दास्तान |
ये सब बंद है ,
मन की सिलवटों में ,
जब - तब खोल जिसे झाँक आती हूँ ,
एक नया जीवन जी आती हूँ ............
इति ....
Tuesday, September 14, 2010
Friday, September 10, 2010
purani yaad
बरसों बाद भाई आया ,
पुरानी यादें साथ लाया |
वह रूठना -मनाना , झगड़ा और शोर ,
तुझसे बंधी है बचपन की डोर |
कंचे, लट्टू , वो काटा की धूम ,
हरा समुंदर , मछली रानी गोल - गोल घूम |
ठेले की कुल्फी ,छल्ली और बुड्ढी के बाल,
हँसते - खेलते निकल गए कितने ही साल |
तेरे माथे पर मेरे नाख़ून के निशान,
तूने भी काटे थे सोते हुए मेरे बाल |
मैने बनाई तेरे पोस्टर पर मूँछ और पूँछ,
आज तक वह बात तू नहीं पाया है भूल |
ढूध के अनगिनत ग्लास बहाए थे हमने ,
रिपोर्ट कार्ड के कितने पन्ने छिपाए थे हमने |
अब भी याद है माँ के जाते ही रसोई में जाना ,
चाय बनाते - बनाते बर्तन का जलाना |
रात होते ही छत पर लपकना ,
पंखे के सामने ही चरपाई हडपना |
राज़ की बात एक - दूसरे को बताते थे ,
फिर उसी बात पर एक दूसरे को धमकाते थे |
पल मे दुश्मन , पल मे दोस्त थे हम ,
न कोई चिंता ,न फ़िक्र न थे गम |
कितने मधुर सुहाने थे वो दिन और रात ,
अब तो बस यह सब है पुरानी याद |..........
इति ..........
पुरानी यादें साथ लाया |
वह रूठना -मनाना , झगड़ा और शोर ,
तुझसे बंधी है बचपन की डोर |
कंचे, लट्टू , वो काटा की धूम ,
हरा समुंदर , मछली रानी गोल - गोल घूम |
ठेले की कुल्फी ,छल्ली और बुड्ढी के बाल,
हँसते - खेलते निकल गए कितने ही साल |
तेरे माथे पर मेरे नाख़ून के निशान,
तूने भी काटे थे सोते हुए मेरे बाल |
मैने बनाई तेरे पोस्टर पर मूँछ और पूँछ,
आज तक वह बात तू नहीं पाया है भूल |
ढूध के अनगिनत ग्लास बहाए थे हमने ,
रिपोर्ट कार्ड के कितने पन्ने छिपाए थे हमने |
अब भी याद है माँ के जाते ही रसोई में जाना ,
चाय बनाते - बनाते बर्तन का जलाना |
रात होते ही छत पर लपकना ,
पंखे के सामने ही चरपाई हडपना |
राज़ की बात एक - दूसरे को बताते थे ,
फिर उसी बात पर एक दूसरे को धमकाते थे |
पल मे दुश्मन , पल मे दोस्त थे हम ,
न कोई चिंता ,न फ़िक्र न थे गम |
कितने मधुर सुहाने थे वो दिन और रात ,
अब तो बस यह सब है पुरानी याद |..........
इति ..........
Tuesday, August 31, 2010
Ghar kaa Angan
जब मैं छोटी थी ,
मेरे घर का आंगन बहुत बड़ा था,
उसमें समाया था पूरा मोहल्ल्ला |
सामने घर में जलते तंदूर की खुशबू ,
हमारे आंगन तक आती थी |
वहाँ पकती सौंधी- सौंधी रोटी ,
हर किसी को बांटी जाती थी |
स्कूल से आते ही ,बस्ता पटक ,
गली में निकल जाते थे ,
कंचे ,गिल्ली -डंडा और वो काटा के शोर से ,
हर आने -जाने वाले को सताते थे |
हमारे आंगन की धूप , सबकी सांझी थी |
अचार , पापड, स्वेटर के फंदे ,
रिश्ते -नाते, हारी -बीमारी सब यहीं निबटते थे |
आधी रात को , चंदू की माँ की बीमारी सुन ,
अब्दुल भागा- भागा आया था ,
अपनी साईकल गिरवी रख ,वही दवा लाया था |
रधिया की शादी में पूरा मोहल्ला रोया था ,
पीटर की रतजगे मे कोई रात भर नहीं सोया था |
कुलवंत भाभी की रजाई के धागे माँ ही डाला करती थी ,
दादी के घुटनों की मालिश सब बारी से कर जाती थी|
एक ही टीवी सबको एक साथ हँसता - और रुलाता था
एक ही फ्रिज सबके काम आ जाता था ,
टेलीफोन की घंटी सुन ,चार घर दूर जाते थे ,
बातों के साथ , चाय भी पी आते थे |
अब मैं हो गयी हूँ बड़ी और सिमट गया है आंगन |
न है तंदूर और गली का शोर ,
हर घर का अपना है राग और अपना ही किस्सा,
अब नहीं बनता कोई किसी का हिस्सा ,
सब काम अब चुपचाप निबट जाते है ,
हम भी शादी की भीड़ मे शगुन दे आते हैं |
सिकुड़ गये है रिश्ते , बदल गयी है निगाहें ,
जलन , इर्ष्या और नफरत की खड़ी है दीवार ,
मेरे घर के आंगन मे अब धूप नहीं आती ,
दोपहर से पहले ही साँझ चली आती है |
अब मैं हो गयी हूँ बड़ी और सिमट गया है आंगन |
इति....
मेरे घर का आंगन बहुत बड़ा था,
उसमें समाया था पूरा मोहल्ल्ला |
सामने घर में जलते तंदूर की खुशबू ,
हमारे आंगन तक आती थी |
वहाँ पकती सौंधी- सौंधी रोटी ,
हर किसी को बांटी जाती थी |
स्कूल से आते ही ,बस्ता पटक ,
गली में निकल जाते थे ,
कंचे ,गिल्ली -डंडा और वो काटा के शोर से ,
हर आने -जाने वाले को सताते थे |
हमारे आंगन की धूप , सबकी सांझी थी |
अचार , पापड, स्वेटर के फंदे ,
रिश्ते -नाते, हारी -बीमारी सब यहीं निबटते थे |
आधी रात को , चंदू की माँ की बीमारी सुन ,
अब्दुल भागा- भागा आया था ,
अपनी साईकल गिरवी रख ,वही दवा लाया था |
रधिया की शादी में पूरा मोहल्ला रोया था ,
पीटर की रतजगे मे कोई रात भर नहीं सोया था |
कुलवंत भाभी की रजाई के धागे माँ ही डाला करती थी ,
दादी के घुटनों की मालिश सब बारी से कर जाती थी|
एक ही टीवी सबको एक साथ हँसता - और रुलाता था
एक ही फ्रिज सबके काम आ जाता था ,
टेलीफोन की घंटी सुन ,चार घर दूर जाते थे ,
बातों के साथ , चाय भी पी आते थे |
अब मैं हो गयी हूँ बड़ी और सिमट गया है आंगन |
न है तंदूर और गली का शोर ,
हर घर का अपना है राग और अपना ही किस्सा,
अब नहीं बनता कोई किसी का हिस्सा ,
सब काम अब चुपचाप निबट जाते है ,
हम भी शादी की भीड़ मे शगुन दे आते हैं |
सिकुड़ गये है रिश्ते , बदल गयी है निगाहें ,
जलन , इर्ष्या और नफरत की खड़ी है दीवार ,
मेरे घर के आंगन मे अब धूप नहीं आती ,
दोपहर से पहले ही साँझ चली आती है |
अब मैं हो गयी हूँ बड़ी और सिमट गया है आंगन |
इति....
Thursday, August 19, 2010
samarpan
होठों की हँसी,
आँखों की नमी ,
घुलमिल कर एक हुई |
तुम्हारे आने से ,
मेरे होने की पहचान परिपूर्ण हुई |
तुम में अपने को खो कर ,
आज मैं सम्पूर्ण हुई |
इति ...
आँखों की नमी ,
घुलमिल कर एक हुई |
तुम्हारे आने से ,
मेरे होने की पहचान परिपूर्ण हुई |
तुम में अपने को खो कर ,
आज मैं सम्पूर्ण हुई |
इति ...
Tuesday, August 17, 2010
Aek Vichaar
जीवित
है बस एक एहसास ,
मैं हूँ
सिर्फ एक आधार ......
बेटी ….पत्नी …..जननी
...या .......साधारण इंसान ?
अस्तिव की
पहचान .........
खोखलापन ….वेदना ….अहम् …
एक
विचार ..................?
Tuesday, August 10, 2010
RISHTAA
तेरा- मेरा रिश्ता है परे ,
झूठी परिभाषाओं से ...........
गुनगुनी धूप - सा ,
मद - मस्त - अलसाया |
नीले खुले अम्बर - सा ,
उन्मुक्त - विस्तृत - धुला -धुला |
बहती धारा - सा ,
निर्द्वंद - निश्छल - अल्हड़ |
कौंधती बिजली - सा ,
चपल - चंचल - रोशन |
बहती बयार - सा ,
शीतल - सुगन्धित - दुलारता |
तेरा - मेरा रिश्ता है परे ,
झूठी परिभाषाओं से .............
झूठी परिभाषाओं से ...........
गुनगुनी धूप - सा ,
मद - मस्त - अलसाया |
नीले खुले अम्बर - सा ,
उन्मुक्त - विस्तृत - धुला -धुला |
बहती धारा - सा ,
निर्द्वंद - निश्छल - अल्हड़ |
कौंधती बिजली - सा ,
चपल - चंचल - रोशन |
बहती बयार - सा ,
शीतल - सुगन्धित - दुलारता |
तेरा - मेरा रिश्ता है परे ,
झूठी परिभाषाओं से .............
Friday, July 23, 2010
दोस्ती
दोस्ती
वे सब रहे बरसों साथ - साथ ,
सपने थे अलग - अलग, फिर भी पास - पास |
चल पड़े सब अपनी - अपनी राह ,
किसने जाने क्या -क्या सहा |
कोई चला ,चलता ही गया ,
कोई उठा ,उठता ही गया |
कोई चला कहीं, पहुँचा कहीं,
कोई घूम फिर कर रहा वहीं का वहीं |
किसीको बदलनी पड़ी, अपनी राह ,
कोई चलते -चलते, भटक गया राह |
कुछ के फले, कुछ के बदले ,
अब क्या पूछना तुम कब ,कहाँ निकले |
आज भी एक सिरा है उन्हें है जोड़ रहा ,
यही काफी है , जो भी मिला हँस के मिला |
............
वे सब रहे बरसों साथ - साथ ,
सपने थे अलग - अलग, फिर भी पास - पास |
चल पड़े सब अपनी - अपनी राह ,
किसने जाने क्या -क्या सहा |
कोई चला ,चलता ही गया ,
कोई उठा ,उठता ही गया |
कोई चला कहीं, पहुँचा कहीं,
कोई घूम फिर कर रहा वहीं का वहीं |
किसीको बदलनी पड़ी, अपनी राह ,
कोई चलते -चलते, भटक गया राह |
कुछ के फले, कुछ के बदले ,
अब क्या पूछना तुम कब ,कहाँ निकले |
आज भी एक सिरा है उन्हें है जोड़ रहा ,
यही काफी है , जो भी मिला हँस के मिला |
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