राजा को भा गयी सुनहरी बुलबुल ,
बुलबुल भी राजा को पा सब गयी भूल |
राजा की ही हाँ में हाँ मिलाती थी ,
राजा के लिए ही हँसती और गाती थी |
अपने कतरे पंख देख कर इतराती थी ,
अपने नए रूप पर स्वयं इठलाती थी |
अपनी उड़ान भूल , फुदकने लगी ,
बंद कमरे के दायरे में टहलने लगी |
इसी को अपनी नियति मान रम गई ,
यही दुनिया उसके तन - मन में बस गयी |
बंद खिड़की , दरवाज़े के पास जब भी गुजरती ,
भीतर कितना सुख है वह यह सोचती |
एक दिन खिड़की खुली रह गयी ,
वह चौखट पर जा कर जम गयी |
ताक रही थी खुला आकाश और हरी घास ,
दिल में जागी नयी उमंग और आस |
राजा के तेवर देख वापस लौट चली ,
अपने अरमान मन में ही कुचल गयी |
शायद अब मैं कभी उड़ न पाऊँगी,
सारी बस उम्र यूँ ही गवायुंगी|
Monday, November 22, 2010
Sunday, November 21, 2010
samsya kaa samadhaan
सामने चल रहा था के० बी० सी०,
और जवाब दे रहे थे हम |
हर प्रश्न का उत्तर ,
जुबान पर था जड़ा,
जैसे हमारे लिए ही था गड़ा |
कहीं न हो रही थी हमसे भूल ,
न हो रही थी हमसे कोई चुक |
सभी सीढ़ियाँ फटाफट चढ़ते चले गए ,
किस्मत के ताले सरपट खुलते चले गए |
पर , हाय सारा कार्यक्रम चल रहा था टी० वी० पर ,
और हम बैठे थे अपने घर की हॉट सीट पर |
ऐसा क्यों होता है , जब समस्या हो किसी और की ,
सारे समाधान होते हैं हमारे पास ,
वही कठिनाई जब होती है अपनी ,
तो अक्ल हो जाती है गुम और शरीर हो जाता है सुन्न |
दूसरे के फटे में टांग अड़ाना आदत है ,
अपनी बात स्वयं सुलझाना मुसीबत है |
दूसरों को सलाह देते हम थकते नहीं ,
अपने आंगन में हम झंकते नहीं |
कितना अच्छा हो , अगर हम दूसरों से पहले अपनी सुने ,
किसी को कहने से पहले अपना मन गुने |
और जवाब दे रहे थे हम |
हर प्रश्न का उत्तर ,
जुबान पर था जड़ा,
जैसे हमारे लिए ही था गड़ा |
कहीं न हो रही थी हमसे भूल ,
न हो रही थी हमसे कोई चुक |
सभी सीढ़ियाँ फटाफट चढ़ते चले गए ,
किस्मत के ताले सरपट खुलते चले गए |
पर , हाय सारा कार्यक्रम चल रहा था टी० वी० पर ,
और हम बैठे थे अपने घर की हॉट सीट पर |
ऐसा क्यों होता है , जब समस्या हो किसी और की ,
सारे समाधान होते हैं हमारे पास ,
वही कठिनाई जब होती है अपनी ,
तो अक्ल हो जाती है गुम और शरीर हो जाता है सुन्न |
दूसरे के फटे में टांग अड़ाना आदत है ,
अपनी बात स्वयं सुलझाना मुसीबत है |
दूसरों को सलाह देते हम थकते नहीं ,
अपने आंगन में हम झंकते नहीं |
कितना अच्छा हो , अगर हम दूसरों से पहले अपनी सुने ,
किसी को कहने से पहले अपना मन गुने |
Tuesday, November 16, 2010
Jab
जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
हल्की धूप , थोड़ी हवा ,
आँखों मे सजा लाना ,
डालकर नैनों में नैन तुम्हारे ,
विचरुंगी जहाँ सारा |
...जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
चंद बादल, एक कतरा आस्मां ,
दिल में अपने दबा लाना ,
बाँहों में सिमिट कर तुम्हारी ,
जी जाऊँगी जीवन सारा |
हल्की धूप , थोड़ी हवा ,
आँखों मे सजा लाना ,
डालकर नैनों में नैन तुम्हारे ,
विचरुंगी जहाँ सारा |
...जब मुझसे मिलने आओ प्रिय ,
चंद बादल, एक कतरा आस्मां ,
दिल में अपने दबा लाना ,
बाँहों में सिमिट कर तुम्हारी ,
जी जाऊँगी जीवन सारा |
Saturday, November 13, 2010
kuch nahi
यह जो तरफ महकी - महकी सी हवा भरमाई है ,
कुछ और नहीं पिया , मेरी यादों की गहराई है |
यह जो चारों तरफ उजली - उजली सी धूप खिलखिलाई है ,
कुछ और नहीं पिया , तेरी याद में आँख शरमाई है |
यह जो चारों तरफ हल्की - हल्की सी धुंध छाई है ,
कुछ और नहीं पिया, अपने महामिलन की परछायी है |
कुछ और नहीं पिया , मेरी यादों की गहराई है |
यह जो चारों तरफ उजली - उजली सी धूप खिलखिलाई है ,
कुछ और नहीं पिया , तेरी याद में आँख शरमाई है |
यह जो चारों तरफ हल्की - हल्की सी धुंध छाई है ,
कुछ और नहीं पिया, अपने महामिलन की परछायी है |
Tuesday, November 9, 2010
tumhara sapnaa
आज , अपनी आँखों में देखा ,
तुम्हारे सपने को देखा |
पाया अपने आप को वहाँ ,
हर जगह सर्वत्र ,
अपलक ताक रहे थे तुम ,
नन्हे बालक की भांति |
और मैं मौन , मुस्कराती ,
भांप रही थी तुम्हारी ,
उत्सुकता तथा आकुलता |
उन कुछ पलों मे ,
गुजर गए अनगिनत युग |
खुली पलक , टूटा सपना ,
तुम थे वहीं , तुम हो जहाँ |
न हो यहाँ , न हो वहाँ |
तन से वहाँ, मन से यहाँ |
Sunday, November 7, 2010
ansuni baat
न तुमने कुछ कहा ,
न मैंने कुछ सुना ,
फिर भी बात हमारी हो गयी |
मेरे आंगन खिला चाँद ,
तेरे आंगन उगा सूरज ,
क्षितिज के पार मुलाकात हमारी हो गयी |
तुमने करी बंद पलकें ,
मैने खोली अलकें ,
स्वप्नों के दरिया मे कश्ती हमारी खो गयी |
तुमने देखा एक ख्वाब ,
मैने जिया वह अहसास ,
दोनों के दिल की धड़कन एक हो गयी................
Thursday, November 4, 2010
achank
कुछ देर साथ चले ,
गए फिर बिछुड़ ,
मन की तख्ती से पोंछ दिया नाम |
न था कोई संवाद ,
न ही कोई अहसास |
फिर अचानक ,
एक दिन ,
हज़ारों की भीड़ में ,
दिख पड़े .....
लहक गयी अग्निरेखा ,
कम्पन हुआ घने बादलों मे ,
और
रोशन हुआ
दिल का कोना - कोना ..........
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