Wednesday, December 22, 2010

apnapan

जब भी करती हूँ तुमसे बातें ,
अपने - आप को पा जाती हूँ ,
न दिखावा ,
न छलावा,
न बनावट ,
न सजावट ,
बस मन की परतों को खोलती जाती हूँ |
तुम भी तो ,
मंद - मंद मुस्कुराते ,
कोरों से मुझे पीते,
मेरी मस्ती ,
मेरी चंचलता ,
मेरा अल्हड़पन ,
मेरा अपनापन ,
हल्के से
थाम लेते हो हाथ मेरा |
काँप जाती हूँ ,
नाज़ुक लता सी ,
और लिपट जाती हूँ शाख से |

Monday, December 20, 2010

nadi si


तुमसे जब भी बात करती हूँ ,
उतर आती है नदी मेरी आँखों में ,
तुम्हारे स्वरों की लहरों में ,
डूबती - उतरती - बहती हूँ ,
कभी तेज , कभी मंथर ,
...गोल - गोल भंवर सी ,
इतराती - बलखाती - अल्हड़,
समा जाती हूँ तुम्हारी आँखों के समुद्र में ,
तुम भी साथ - साथ बहते - बहते ,
मुझे भर कर बाहों में हर बार ,
विलीन हो जाते हो प्रियतम बार - बार |

Thursday, December 16, 2010

Kitaab - si

वह
पुरातान ग्रन्थ सी ,
सिर्फ बैठेक की शेल्फ पर सजती हैं  |
वह
सस्ते नॉवेल सी ,
सिर्फ फुटपाथ पर बिकती हैं  |
वह
मनोरंजक पुस्तक सी
उधार लेकर पढ़ी जाती हैं  |
वह
ज्ञानवर्धक किताब सी ,
सिर्फ जरुरत होने पर पलटी जाती हैं  |
गन्दी , थूक, लगी उँगलियों से ,
मोड़ी, पलटी , और उमेठी जाती हैं |

पढ़ो हमें सफाई से ,
एक - एक पन्ना एहतियात से पलटते हुए ,
हम सिर्फ समय काटने का सामान नहीं ,
हम भी इन्सान है , उपहार में मिली किताब नहीं .................

Sunday, December 12, 2010

Munni badnaam hui

कल रात एक वारदात हुई , कॉल - सेंटर से लौटते हुए ,
मुन्नी बदनाम हुई .............|
गली - नुक्कड़ - और मिडिया में , इसकी चर्चा सारे आम हुई |
किसी ने कहा भई , क्या ज़माना आ गया है ,
इन लड़कियों को फैशन कम करना चाहिए ,
अपने - आप मुसीबत को न्योता देती हैं ,
फिर उस बात को ले कर कोर्ट - कचहरी में रोती हैं |
मतलब अगर पर्दा रह गया तो , अपराध कम हो जायेंगे ,
फिर यह भेड़िये नज़र नहीं उठा पायेंगे ?
तो फिर क्यों न ऐसा किया जाये ,
उन दरिंदों की आँखों पर पट्टियाँ , बांध दी जाये |
ताकि हर मुन्नी चैन की साँस ले सके ,
विक्षिप्त इस समाज में इज्ज़त से जी सके |

Friday, December 10, 2010

Zindgi

जिंदा हूँ मगर , जिंदगी ढूनढती हूँ |
हैवानों के शहर में , इंसानों को ढूनढती   हूँ |
सोने - चाँदी के बाज़ार मे फूलों को ढूनढती   हूँ |
बंद घुटती दीवारों में , खुला आकाश ढूनढती   हूँ |
काली - भयावह रात में , रोशनी की रसधार ढूनढती   हूँ |
बनावटी - खोखली हंसी में , मासूम मुस्कराहट को ढूनढती   हूँ |
आधे - अधूरे शब्दों में , संवाद को ढूनढती   हूँ |
रुखी - सुखी इस जिंदगी में , प्यार का दीदार ढूनढती   हूँ |

Monday, December 6, 2010

Shabd

शब्दों का माया जाल ..
रंगहीन ,
गंधहीन ,
 सम्वेदेन्हीन ,
शब्द कोरे शब्द .....
खोखले ,
बनावटी ,
मटमैले ,
पन्नों पर बिखरे - बिखरे ...
हवा में तिरते - तिरते ,
सर्पीली गुंजलिका से ,
शब्द ही शब्द ........
मेरे होठों से ,
तुम्हारे कानों तक ,
रूप बदलते ....
कलम की स्याही से ,
दिल की गहराई तक ,
अर्थ बदलते .....
शब्द ........शब्द ........ आधे ...अधूरे |

Sunday, December 5, 2010

meri pachaan

मैं तो हूँ मस्त बयार , बांधने की तुम्हारी कोशिश  है बेकार |
यह भटकन - अटकन -उलझन,  ही तो है मेरी पहचान |
निर्द्वंद , अबाध , बहती ,...
निर्मल , शीतल , सुगन्धित ...
प्यार और त्रास भी ...
प्यास और पानी भी ..
जीत भी और हार भी ...
सवाल भी और जवाब भी ...
मैं तो हूँ मस्त बयार , बांधने की तुम्हारी कोशिश है बेकार ........|