Wednesday, September 7, 2011

एक बार फिर ....

एक बार फिर ....
फिर दहली धमाकों से दिल्ली ,
फिर लग गया रेड अर्लट सडकों पर ,
फिर मारी गई मासूम जनता बिचारी |
हो रही सत्ता के गलियारों में ,
आरोपों - प्रत्यारोपों की बौछार |
आखिर ऐसा क्यों होता है बार -बार ,
इतने बड़े शक्तिशाली तंत्र की ,
हर बार उड़ जाती हैं धजिय्याँ |
अपनी ही परछाई से सहमा है जन ,
डरी-डरी सूरतें ,हर आंख  हैं नम |
एक बार फिर कायर माँ को रौंद गए ,
हमारे सयंम को झंकार गए |
कब तक आखिर --- कब तक ...
बंद  करो यह मरने - मारने का व्यापार..
बंद करो यह अत्याचार ..बंद करो ....अब बस बंद करो .......

Friday, August 19, 2011

ab to aa jao

भर आया है प्यार मेरा ,
इन नैनों के कोरों तक ,
अब तो आ जाओ साजन,
सांसें न रुक जाये भोर होने तक |
माथे पर मेरे अगर ,
लबो का  तेरे हो कुमकुम ,
ह्रदय  मे गूंजे हल्का सा श्रृंगार ,
ठहर जाये धरती ,थम जाये अस्मा |
बाँहों की तेरी अगर,
मिल जाये चन्दनहार ,
आँखों मे तेरी देखूँ ,
डूब कर भी ,पा जाऊ सारा संसार |

Tuesday, August 9, 2011

Zindgi badal rahi hae

जिंदगी बदल रही है , जिंदगानी बदला रही है ,
तेरे - मेरे जीने की कहानी बदल रही है |
एक की कमाई पर चलता था घर ,
अब सब की भी कम पड़ रही है |
नज़र बदल रही है , नज़रिया बदल रहा है ,
नज़रंदाज़ करने का तरीका बदल रहा है |
कहते थे कभी , खा कर जाना ,
अब सुनते हैं "आप खा कर आए होंगे |
बातें होती थी आमने - सामने कभी ,
अब हर किसी से नज़रे चुरा कर मिला रहे हैं |
पोशाक बदल रही है , पहनावे बदल रहे हैं ,
छिपाने की बजाय, दिखाने के अंदाज़ बदल रहे हैं |
रिश्ते बदल रहे हैं , नाते बदल रहे हैं ,
जन्म जन्मातर के साथी बदल रहे हैं |
इसमें आश्चर्य क्या ,
और अचम्भा क्यों ,
वक़्त के साथ ...हम भी बदल रहे हैं .......

Sunday, August 7, 2011

तुम्हारी बड़ी

प्रिय भैय्या ,
राखी - टीका जो भिजवाया था ,
वह अब तक मिल गया होगा |
उसके साथ रखा कार्ड ,
मैने खुद बनाया है ,
अपने हाथों से सजाया है ,
जैसे बरसों पहले ,
तुम्हारे माथे पर ,
रोली - चावल का तिलक सजाती थी |
अब, छोटी से बँधवा लेना ,
और मेरा शगुन भी उसे ही दे देना |
बचपन में ग्यारह रूपए से लेकर ,
कॉलेज में पाँच सौ रूपए मिलने तक |
याद है मैं कितना लड़ जाया करती थी ,
बड़ी होने की धौंस दिखा कर ,
सदा  ज्यादा  ही वसूल कर पाती थी |
पापा भी हमेशा हँस कर कहते ,
अरे मुँह न फुला ,तेरा हक़ है ,ले -ले |
माँ पर आँख दिखा समझाती थी ,
जो मिले , उसमें खुश रहना सीख |
पापा का बटुआ ले माँ को चिढ़ाती,
कमरे से हवा हो जाती थी |
तब नहीं नहीं समझी थी ,
अब समझ गयी हूँ |
नहीं  कुछ नहीं चाहिए ,
बस तुम्हारी कलाई का स्पर्श ,
माथे की छुअन .
और ...
मेरे गाल पर हलकी सी चपत |
हर बार की तरह , इस बार भी ,
वह भी छोटी को दे देना |
तुम्हारी बड़ी .........!!

Thursday, August 4, 2011

hakikat

भुलाने की लाख कोशिश में ,
तू हर पल याद आता है |
दिन तो गुज़र जाता है मसरूफियत में ,
शाम होते ही चिरागे मोहब्बत जल जाता है |
माना कि तू है एक सतरंगी ख्वाब ,
हर रात हकीकत क्यों बन जाता है |.

Sunday, July 31, 2011

अबकी तीज

पिछली बार की तरह इस बार भी नहीं आ पाऊँगी ,
अम्मा कह देना ......
झूले की पेंग से , महावर की चमक  से ,
ढोलक की थाप से ,सावन के गीत से ,
तुलसी के चौरे  से ,आम की बौर से ,
मेहँदी की महक से , चूड़ी की खनक से ,
मेघ से - मल्हार से , गुड्डे और गुडिया से ,
पड़ोस की रधिया ताई से  , रामदीन हलवाई से ,
बचपन की सखी - सहेलियों से , भाभी -बहना से ,
हर दीवार-  कोने से , मोहल्ले के हर दरवाज़े से ,
बिट्टो तुम्हारी बहुत दूर है ,
जिम्मेवारी से भरपूर है ,
आसान  नहीं इत्ती दूर का आना ,
बच्चों की पढाई , घर की रसोई ,
रोज़ के काम , मेहमानों का आना - जाना ,
अगली बार शायद .......... आ जाये ....
अम्मा ज़रूर कह देना .............













Tuesday, July 26, 2011

Tum mere ho

तुम , सिर्फ अहसास हो कि नहीं ..
तुम , मेरे आस - पास हो कि नहीं ..
तुम , मात्र एक ख्याल हो कि नहीं ...
तुम , मन की आस हो कि नहीं ...
तुम , होठों की मुस्कान हो कि नहीं ..
तुम,शीतल मंद बयार हो कि नहीं ..
तुम , पन्नो मे दबा गुलाब हो कि नहीं ..
तुम, कही ठहरा वक़्त हो , हो कि नहीं ..
तुम , न होकर भी मेरे हो ,हो कि नहीं .....!!!!