Monday, February 11, 2013

तेरा नाम

कुछ कहीं टूटा ,
न आवाज़ ,
न शोर ,
फिर भी टूटा तो सही ॥ 
बंद थी पलकें ,
भिंची हुई कस के 
फिर भी बहा तो सही ॥ 
रोका बहुत ,
संभाला बहुत ,
सिरहाने तले दबा था जो ,
करवटों से सलवटों पे ,
फिर भी तेरा नाम पसरा ....

Monday, February 4, 2013

आ एक पल जी ले

आ बैठ पास, कुछ खामोशी पढ़ ले ,
ले हाथ , हाथों के दरमिया ,इन लकीरों को सुन ले ,
हो सके तो, छु इन पलकों को ,यह नमी चख ले ,
यह देख इन काजल की स्याह - धुंधली लकीरों मे ,
तेरी इबादत मे लिखी आयतों -सा कुछ बहता है ,
आ , ज़रा इन को बुदबुदा बार - बार ,
अपनी साँसों मे भर निर्मल कर दे ,
न हमसफर, न हम साया है तू ,
कैसे कहूँ ,आ इन कदमों से मिला कदम ,
आज तू भी एक छोटा सा गुनाह कर ले ,
एक पल दे, आ एक पल जी ले ....
एक पल ले, जा एक पल जी ले ..

Tuesday, January 29, 2013

पूरे चाँद की आधी रात

पूरे चाँद की आधी रात 

पिघलता मन ,
सुलगते एहसास ,
तेरो आंखो की बिल्लोरी चमक ,
मेरे कंगन की जादुई खनक ,
उफ़्फ़ ...उफ़्फ़ यह पूरे चाँद की आधी रात , 
धुत्त लम्हे ,
मौन जज़्बात ,
तेरे आगोश मे पिघलती मै,
मेरी खुशबू से गमकते तुम ,
उफ़्फ़ - उफ़्फ़ यह पूरे चाँद की आधी रात

Friday, January 25, 2013

क्या मै स्वतंत्र हूँ ?

दायरे - दायरे और दायरों मे दायरे ,
छोटे - बड़े , लंबे - चौड़े, गोल- चोकौर,
कहीं दिखते कहीं छिपते ,
कहीं वास्तविक कहीं काल्पनिक ,
कभी उभरते कभी झीने - झीने ,
देखो तो हर कोई सिमटा है ,
अपने - अपने दायरों के दरमियान ,
कौन है स्वतंत्र यहाँ ?
धार्मिक - सामाजिक - पारिवारिक ,
हर स्तर पर बंधा है हर कोई ,
स्वतन्त्रता एक जज्बा है ,
जो हर दिल मे सुलगता है ,
यह वो अनबुझी प्यास है ,
जिससे हर कोई झुलसता है ,
क्या मै स्वतंत्र हूँ ?
यह तो यक्ष प्रश्न है ????
?

Wednesday, January 23, 2013

बूंद - बूंद जिंदगी



माँ पानी भर - भर सुराही खरीदती थी ,
बिटिया इनमा छोटा - छोटा सुराख रहित ,
पता न कहाँ से पानी चू जाए ,
इन बेचन वारी का ,बस हमरी अंटी ढीली किए जाए ,
सुराही वाली भी बरामदे मे सुस्ताती हुई ,मुसकाए ,
हाँ - हाँ पूरा तसल्ली कर लिजो,
हम न कहीं भागे जा रहे ।
बिट्टों तो बस दोनों की नौक- झोंक का मज़ा ले रहे ,
अम्मा बिट्टों को ख़रीदारी के गुर सिखाती रही ,
संग - संग कुछ जिंदगी भी समझा रही ,
बिटिया तो मस्ती मे डूबी कुछ और ही गुनगुना रही ,
आज , बिटिया को अम्मा है बहुत याद आ रही ,
लबालब है जिंदगी ,न दिखती कोई दरार या तड़कन ,
फिर भी जाने कहाँ से रिस रही ... रिस रही !!!!!!!

Tuesday, January 15, 2013

कैसे नहोगे कुंभ ...कैसे नहोगे कुंभ ????

हर हर गंगे ...हर हर गंगे का शोर ,
पावन मान हम नदी को भी पूजते ,
जन्मभर के पाप एक डुबकी मे छूटते ,
पतितपावनी , जगतजननी माँ है यह ,
तभी तो करोड़ों श्रद्धालु हर बार हे जुटते ,

नहीं सुनती इस कोलाहल मे मासूमों की चीख ,
जन्मी मै जनमानस को तारने सुरसरि है कह रही ,
रो रही भागीरथी बिचारी देख मानवता की कलुषता ,
मलिनता को धोना ही बस मेरी नियति है ,
जन्मी थी हिम तृंग के पावन अंचल मे ,
ले नीलकंठ का सहारा धरा को सिक्त करने आई ,
आस्था - संस्कृति के नाम पर कुचली गयी ,
कर आत्म मंथन हे बंदे , गंगा तो तेरे आँगन खेले ,
वह देख बह रही चंचल -निर्मल ,
हर गाँव - गलियारे मे ,माँ - बेटी- बहन- पत्नी के रूप मे ,
तेरा जीवन है संवार रही ,
उसकी कर इज्जत तू अपना जीवन सुधार ले ,
कैसे नहोगे कुंभ जब तेरी ब्रह्मपुत्री नग्न पेड़ों पे झूल रही ?
कैसे नहोगे कुंभ जब सड़कों पे सरेआम जाह्नवी है लूट रही ?
कैसे नहोगे कुंभ ...कैसे नहोगे कुंभ ??????????

Monday, January 14, 2013

छोड़ो जाने दो क्यों कहूँ ..अब क्या कहूँ ???

जब बोलते हो कर्ण , सुनते हो होठ ,
तब कितना भी पटको सिर ,
आवाज़ लौट- लौट आती है,
जो चीखती - दहाड़ती है भीतर ,
वह वही लावारिस लाश सी दम तोड़ जाती है ,
भिनभिनाती है वादो व नारो की मक्खियाँ ,
सत्ता - वर्दी के कूड़ेदान मे कहीं दफन हो जाती है ,
क्या कहूँ ....किससे कहूँ .... और कभी तो लगता है ,
छोड़ो जाने दो क्यों कहूँ ...?
छोटे - छोटे मासूम बच्चे ,
जब किसी के पागलपन का हो शिकार ,
हवस और नशा मिल लूटे अस्मत ,
नंगा जिस्म हो पड़ा किनारे ,
न कोई रहनुमा न कोई मुक्ति दाता,
जिनके हाथ कानून वही घातक,
क्या कहूँ ....किससे कहूँ .... और सच मानो तो ...
छोड़ो जाने दो क्यों कहूँ ..अब क्या कहूँ ???.?