Tuesday, August 20, 2013

याद दिलाती राखी


धागा कच्चा हो या पक्का ,
चमकीली हो या फीकी ,
कीमत नहीं प्यार के मेरी ,
भाई भेज रही हूँ वेब से राखी .... 
बचपन की याद है,
शरारतों की बरसात है ,
पतंग का माँझा ,लट्टू की डोर ,
माँ की धमकी, पापा की डांट,
उन सभी की याद दिलाती राखी ,
मेरी मांगो की लंबी लिस्ट ,
तेरे वादो की लंबी फेहरिस्त ,
कुछ पूरी , कुछ अधूरी ,
थोड़ा रूठना थोड़ा मनाना,
रोना - झिकना फिर खिलखिलाना ,
जाने क्या - क्या याद दिलाती राखी ,
साइकिल पर बैठा गली का फेरा ,
चोरी से बर्फ का गोला खाना ,
पूरी रात वी सी आर पर पिक्चर ,
टिनटिन और फ़ेन्टम की छीनाझपटी ,
बार - बार याद दिलाती यह राखी ....

Sunday, August 18, 2013

चाहूँ अपना कोना

सीखा मैने बचपन से ही ,
अपना हिस्सा सबको देना ,
बिना न नुकर सब कुछ सहना ,
न रखना तुम अपनी बात ,
बस सिर झुका करना अमल ,
यूं तो कहने को घर मेरा भी है,
फिर भी चाहूँ अपना कोना ...... 
मेरी भी करे कोई फिकर ,
मुझ को भी देखे एक नज़र ,
मेरा भी हो कोई जिक्र ,
न रह जाऊँ बन सामान,
बन धड़कन धड़कूँ मैं.....
बन मुस्कान खिल जाऊँ ,
अब तक सिर्फ बनी नींव का पत्थर,
संगमरमरी मणि बन शीर्ष पर लहराऊँ मैं .......

Monday, August 12, 2013

बार - बार हर बार वही सवाल

कभी तो ऐसा था तुम सब जान जाती थी ,
मेरे आने से पहले मेरी आहट पहचान जाती थी,
अब क्यो पूछती हो बार - बार , हर बार वही सवाल ,
तू खुश तो है न ? सब ठीक हे न ?
हाँ , अम्मा , बहुत , बहुत से भी ज़्यादा बहुत ,
सारी सुख - सुविधाओं से भरपूर ,
गहने बनवाती , हुकुम चलाती,
रानी - महरानियों सा ठसका ,
पूरे परिवार का लबालब प्यार ,
तेरी बिट्टों का चलता है राज़,
तू तो स्वर के आरोह - अवरोह को जान जाती थी ,
बिन पकड़े ही नब्ज़ का ताप जानती थी ,
अम्मा , अब क्या हुआ भूल गई क्या ?
फिर भी करती है वही सवाल ,
जानती नहीं या करती है बहाना ,
बेकार ही इतिहास का दोहराना ,
बार - बार हर बार वही सवाल ........

Thursday, August 8, 2013

याद है न

याद है न , 
जहाँ खड़े थे तुम ,
पत्तियों से झाँकता ,
बेशर्म सूरज तुम्हें ,
गलबहियाँ ले रहा था , 
हल्के परेशान तो थे ,
पर जमे रहे उसी कोने से ,
क्यों नहीं बड़े आगे ?
क्या होता ,शायद कुछ ,
हम - तुम करीब हो जाते ,
अड़ियल - टट्टू हो न ,
"मै" मे अड़े के अड़े ,
आज भी है कोना वही ,
बस एक तुम नहीं ,
सूरज भी नहीं करता अब कोई मनमानी ....

Wednesday, August 7, 2013

समय का फेर

एक समय था ,
जब इस दीवार मे ,
एक खुली खिड़की थी ,
उसमे से कभी - कभी ,
कुछ ज़िंदा साँसे झाँका करती थी ,
हल्की से नर्म बयार बहा करती थी ,
नर्म - गरम हंसी खन खनाती थी ,
पर अब नहीं ..... अब नहीं .....
पुख्ता है दीवार ,
चुन गयी है खिड़की ,
गुज़र गयी है साँसे ,
ज़हरीली है बयार ,
मुरझाई सी हंसी ,
समय का फेर .......समय का फेर ....

Saturday, August 3, 2013

चल झुट्ठा.... चल झुट्ठा ..

सुनो , याद है तुम्हें जब तुमने कहा ,
मुझे तुमसे प्यार है ...
चल , झुट्ठा -- कह मै खिखिलाई ,
नहीं , तू क्यों नहीं करती मेरा यकीन ॥
सच्ची - मुच्ची ?
अच्छा बता , गर मै न मिलूँ तो ?
तो - तो मै मर जाऊंगा ... 
और भी ज़ोर से हँसी, 
उन्मुक्त झरने से - खिल खिल ,
बकवास सब ,ऐसा ,सब होता रिसालों - किताबों मे .... 
तू एसी क्यों है , क्यों नही दिखता तुझे ,
मेरा लबलबाता प्यार ...
सुन हर बार जताना ज़रूरी है क्या ?
कह , इतराती , ठुमकती चल दी वह अलबेली नार .....
आज सुनो तुम , सात समुन्द्र - पार ,
साथ हँसता - बोलता परिवार ,
मै वही , कहती , चल झुट्ठा.... चल झुट्ठा ....

Tuesday, July 30, 2013

काश लौट आए

जनवरी की वो कड़कड़ाती ठंड,
एक नदी , एक सपाट पत्थर ,
उस पर सिमटे तुम - हम ...... 
एक छोटी सी कच्ची टपरी ,
एक चूल्हा , एक खदबदाती पतीली ,
फूँक - फूँक पीते तुम - हम ....... 
एक बर्फीली बहती ताल ,
एक नाव, एक मांझी ,
एक दूजे को समेटते तुम - हम ...... 
एक पतली , घुमावदार सड़क ,
एक ही मंजिल , एक ही सफर ,
हिचकोले लेते , गुनगुनाते तुम हम......
काश लौट आए ...