वह ऊँचा पहाड़ , नंगा खड़ा था |
गर्व से उसका माथा चड़ा था |
न पेड़ , न पौधे , न ही घास थी वहाँ |
पहुँचे अनेक , पर रुके नहीं वहाँ |
सबसे अलग महान और एकाकी |
न चिड़िया - पंछी न हवा थी बाकी |
चेहेरे पर मुस्कान दिल मे दर्द छिपाए |
रंगों - संगो को वह है तरसता रहे |
यही है इतना ऊँचे होने की मज़बूरी |
जो बड़ा देती है अपनों से दूरी |
इसलिए मै अपने आमपन मे ही खुश हूँ |
भीड़ मे खोकर भी, अपने आप मे ख़ास हूँ |
इति ......
Wednesday, July 7, 2010
Monday, July 5, 2010
mujhe chaiye
मुझे चाहिये घर ,
बंद दीवारें नहीं |
मुझे चाहिये हंसी ,
गहनों की झंकार नहीं |
मुझे चाहिये समय ,
एक युग नहीं |
मुझे चाहिये खुला आकाश ,
पूरी कायनात नहीं |
मुझे चाहिये आँखों के जाम ,
पूरा मयखाना नहीं |
मुझे चाहिये एक साथी ,
रखवाला नहीं |
मुझे चाइए एक इन्सान ,
भगवान नहीं |
इति.............
बंद दीवारें नहीं |
मुझे चाहिये हंसी ,
गहनों की झंकार नहीं |
मुझे चाहिये समय ,
एक युग नहीं |
मुझे चाहिये खुला आकाश ,
पूरी कायनात नहीं |
मुझे चाहिये आँखों के जाम ,
पूरा मयखाना नहीं |
मुझे चाहिये एक साथी ,
रखवाला नहीं |
मुझे चाइए एक इन्सान ,
भगवान नहीं |
इति.............
Saturday, July 3, 2010
sapno ki duniyaa
वह छोटी सी चिड़िया ,
एकांत की तलाश में , दूर बहुत निकल गयी |
शीतल ताल ,
सुनहरा आकाश ,
ऊँचा पहाड़ ,
पाकर वही बस गयी |
आबादी का कोलाहल ,
रिश्ते का धूयाँ ,
यादों की मिट्टी,
को वह अब तरस गयी |
पलकों का गीलापन ,
होठों की हंसी ,
दिल की चाहत ,
सपनों की दुनिया बन गयी |
.........इति ...........
एकांत की तलाश में , दूर बहुत निकल गयी |
शीतल ताल ,
सुनहरा आकाश ,
ऊँचा पहाड़ ,
पाकर वही बस गयी |
आबादी का कोलाहल ,
रिश्ते का धूयाँ ,
यादों की मिट्टी,
को वह अब तरस गयी |
पलकों का गीलापन ,
होठों की हंसी ,
दिल की चाहत ,
सपनों की दुनिया बन गयी |
.........इति ...........
Sunday, June 27, 2010
aek cheraa
चाँद के चहेरे पर एक अक्स नज़र आता है ,
याद है जब एक साथ घंटो चाँद को निहारा करते थे ,
आज भी नज़र आती है तुम्हारी आंखे चाँद मे,
एक खामोश गर्माहट फैल जाती है चारो तरफ ,
उस गर्माहट की चादर लपेट ,
इंतजार करती हूँ अगली रात का |
इति .........
याद है जब एक साथ घंटो चाँद को निहारा करते थे ,
आज भी नज़र आती है तुम्हारी आंखे चाँद मे,
एक खामोश गर्माहट फैल जाती है चारो तरफ ,
उस गर्माहट की चादर लपेट ,
इंतजार करती हूँ अगली रात का |
इति .........
rishta
समपर्ण ..............
सम्पूर्ण समपर्ण ............
चाह कर भी नहीं हो पाता ,
विद्रोही मन मेरा ,
प्रशनों की दीवार पर अटक जाता है ,
रिश्तों का यह ताना - बाना,
जितना सुलझाती हूँ ,
उतना ही उलझता जाता है |
इति.........
सम्पूर्ण समपर्ण ............
चाह कर भी नहीं हो पाता ,
विद्रोही मन मेरा ,
प्रशनों की दीवार पर अटक जाता है ,
रिश्तों का यह ताना - बाना,
जितना सुलझाती हूँ ,
उतना ही उलझता जाता है |
इति.........
Friday, June 25, 2010
kyuoki
क्योकि वह याद था ,
साथ है |
क्योंकि वह गीत था,
आवाज़ है |
क्योंकि वह धड़कन था ,
अहसास है |
क्योंकि वह दीपक था ,
प्रकाश है |
क्योंकि वह साँस था ,
आस है |
क्योंकि वह हमारा था ,
पहचान है |
इति ..............
साथ है |
क्योंकि वह गीत था,
आवाज़ है |
क्योंकि वह धड़कन था ,
अहसास है |
क्योंकि वह दीपक था ,
प्रकाश है |
क्योंकि वह साँस था ,
आस है |
क्योंकि वह हमारा था ,
पहचान है |
इति ..............
Wednesday, June 23, 2010
Kyuoki
क्योकि वह बादल था ,
बरस गया |
क्योकि वह सपना था ,
टूट गया |
क्योकि वह तारा था ,
डूब गया |
क्योकि वह वक़्त था ,
बीत गया |
क्योकि वह आंसू था ,
छलक गया |
क्योकि वह हमारा था ,
छूट गया |
इति ...........
बरस गया |
क्योकि वह सपना था ,
टूट गया |
क्योकि वह तारा था ,
डूब गया |
क्योकि वह वक़्त था ,
बीत गया |
क्योकि वह आंसू था ,
छलक गया |
क्योकि वह हमारा था ,
छूट गया |
इति ...........
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