Saturday, September 7, 2013

मेरा - तेरा बचपन

अतीत का वह पहला पन्ना ,
कितना सुखद , कितना भोला ,
न कोई चिंता न ही कोई फिकर ,
दोस्तों के संग बस धौल - धप्पा .... 
बारिश की बूंदों के संग - संग ,
छत पर जम कर खूब उछलना,
उड़ती पतंग के संग - संग ,
आसमान मे ऊंचे ही ऊंचे उड़ना ,
बना हवा मे महल और बुर्जी ,
पारियों के संग खूब विचरना..... 
माँ की आवाज़ को कर नाकारा,
गली मे रात होने तक खेलना ,
खाना - पीना किसीके भी घर,
अपना ही हो यह कब सोचना ,
घुटने की चोट पर धोती के कतरन ,
हल्दी - चूने का टपकता लेप ,
फिर भी करना जम कर हुड़दंग ,
अतीत का वह पहला पन्ना ,
कितना सुखद ...कितना भोला ......मेरा - तेरा बचपन .....!!!

Saturday, August 24, 2013

वो तुम ही थे

सुनो वो तुम ही थे न ,
जो हिस्साब की क्लास मे ,
सवाल हल करने की बजाय ,
चोरी- चोरी लिखते - काटते,
हाशिये पर मेरा और अपना नाम ,
कितनी बार , अनेकों बार ,
छिपाते दूसरों से पेन की रगड़ते ज़ोर से ,
पूरी ताकत से ....... 
क्या छिपा रहे थे सबसे ,
जो पनप रहा था , मन के भीतर ,
दबी - दबी मुस्कुराहट ,
पीठ पीछे फुसफुसाहट ,
क्या सुनती नहीं थी तुम्हें ,
या सुन कर भी रहते थे अनजान,
गलती से गर कोई लेता मेरा नाम तो ,
मुंह बिचका देते , आँखें तरेर ,
हो जाते मरने - मारने को तैयार ,
सबको कहते झुठा यह सब बेसिर पेर की बात ........
सुनो , वो तुम ही थे न ,
जो आधी छुट्टी के वक़्त ,
उसी नल के पास जम कर खड़े होते ,
जहाँ मैं आती सहेलियों के साथ ,
जानबूझ कर देर तक पीते पानी ,
मै खड़ी रहती करती इंतज़ार ,
टोकने पर आँखें तरेर कहते ,
अब क्या पानी पीना भी गुनाह है,
देकर धक्का निकल जाते ,
सुनो वो तुम ही थे न ....तुम ही .....तुम .....
सबको करते - करते झूठा साबित ,
कितना सच कर बैठे ,
जो नहीं कहा कभी ,
उसी पर अमल कर बैठे ,
क्यों नहीं कह पाये ,
जो तुम कहना चाहते थे ,
और मैं सुनना चाहती थी ....सुनो ,
वो तुम ही थे न .....तुम ...ही ...तुम.........
रख दिया हाशिये पे मुझे सदा के लिए ..... वो तुम ही थे न ...........तुम....?????

Friday, August 23, 2013

( तेरी याद बाकी है )

वो तुम्ही थे न ,
जो सर्दी , गर्मी , बरसात ,
सिकुढ़ते , जलते , भीगते ,
उस बिन टपरी वाले बस - स्टॉप पर करते थे ,
मेरा दिन भर इंतज़ार ........... 
जबकि पता था कि मै ,
नहीं आऊँगी , 
फिर भी .... क्यों ???? 
वो तुम्ही थे न ,
सर्दी , गर्मी , बरसात ,
सिकुढ़ते , जलते , भीगते ,
उस कुल्फी वाले से ले कुल्फी ,
पिघलने तक करते थे इंतज़ार ,
जबकि पता था कि मै ,
नहीं खाऊँगी ,
फिर भी क्यों.....??????
आज भी वह बिन टपरी का बस स्टॉप ,
वही खड़ा है,
वह कमबख्त कुल्फी वाला भी ,
बिना नागा घंटी बजता है ,
तुम नही, बस तुम नहीं .......सिर्फ मै ...अपने साथ ॥ ( तेरी याद बाकी है )

Tuesday, August 20, 2013

याद दिलाती राखी


धागा कच्चा हो या पक्का ,
चमकीली हो या फीकी ,
कीमत नहीं प्यार के मेरी ,
भाई भेज रही हूँ वेब से राखी .... 
बचपन की याद है,
शरारतों की बरसात है ,
पतंग का माँझा ,लट्टू की डोर ,
माँ की धमकी, पापा की डांट,
उन सभी की याद दिलाती राखी ,
मेरी मांगो की लंबी लिस्ट ,
तेरे वादो की लंबी फेहरिस्त ,
कुछ पूरी , कुछ अधूरी ,
थोड़ा रूठना थोड़ा मनाना,
रोना - झिकना फिर खिलखिलाना ,
जाने क्या - क्या याद दिलाती राखी ,
साइकिल पर बैठा गली का फेरा ,
चोरी से बर्फ का गोला खाना ,
पूरी रात वी सी आर पर पिक्चर ,
टिनटिन और फ़ेन्टम की छीनाझपटी ,
बार - बार याद दिलाती यह राखी ....

Sunday, August 18, 2013

चाहूँ अपना कोना

सीखा मैने बचपन से ही ,
अपना हिस्सा सबको देना ,
बिना न नुकर सब कुछ सहना ,
न रखना तुम अपनी बात ,
बस सिर झुका करना अमल ,
यूं तो कहने को घर मेरा भी है,
फिर भी चाहूँ अपना कोना ...... 
मेरी भी करे कोई फिकर ,
मुझ को भी देखे एक नज़र ,
मेरा भी हो कोई जिक्र ,
न रह जाऊँ बन सामान,
बन धड़कन धड़कूँ मैं.....
बन मुस्कान खिल जाऊँ ,
अब तक सिर्फ बनी नींव का पत्थर,
संगमरमरी मणि बन शीर्ष पर लहराऊँ मैं .......

Monday, August 12, 2013

बार - बार हर बार वही सवाल

कभी तो ऐसा था तुम सब जान जाती थी ,
मेरे आने से पहले मेरी आहट पहचान जाती थी,
अब क्यो पूछती हो बार - बार , हर बार वही सवाल ,
तू खुश तो है न ? सब ठीक हे न ?
हाँ , अम्मा , बहुत , बहुत से भी ज़्यादा बहुत ,
सारी सुख - सुविधाओं से भरपूर ,
गहने बनवाती , हुकुम चलाती,
रानी - महरानियों सा ठसका ,
पूरे परिवार का लबालब प्यार ,
तेरी बिट्टों का चलता है राज़,
तू तो स्वर के आरोह - अवरोह को जान जाती थी ,
बिन पकड़े ही नब्ज़ का ताप जानती थी ,
अम्मा , अब क्या हुआ भूल गई क्या ?
फिर भी करती है वही सवाल ,
जानती नहीं या करती है बहाना ,
बेकार ही इतिहास का दोहराना ,
बार - बार हर बार वही सवाल ........

Thursday, August 8, 2013

याद है न

याद है न , 
जहाँ खड़े थे तुम ,
पत्तियों से झाँकता ,
बेशर्म सूरज तुम्हें ,
गलबहियाँ ले रहा था , 
हल्के परेशान तो थे ,
पर जमे रहे उसी कोने से ,
क्यों नहीं बड़े आगे ?
क्या होता ,शायद कुछ ,
हम - तुम करीब हो जाते ,
अड़ियल - टट्टू हो न ,
"मै" मे अड़े के अड़े ,
आज भी है कोना वही ,
बस एक तुम नहीं ,
सूरज भी नहीं करता अब कोई मनमानी ....