तुम्हें पता है न कि,
हूँ, मैं पारदर्शी तुम्हारे लिए ,मुझे भी है पता ...............क्यूँ घुल जाती हूँ ,तुम्हारे सामने और,सोख लेते हो तुम ,मेरी जलन , परेशानी , पीड़ा ,अपने नर्म होठो के,सुरभित स्पर्श से ..............................बुहार देते हो ,मिथ्याबोध , भ्रम , नुक्स ,अपनी झिलमिलाती पालको की हल्की सी सरसराहट से ..............मुझे है पता कि,मैं हूँ पारदर्शी तुम्हारे लिए.......मुझे है पता .....सिर्फ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ..................Thursday, October 22, 2015
Saturday, July 4, 2015
दो रंग
वह देखो ....देखो अरे देखो तो ज़रा ,
जन्मा पलको पे एक हंसी सपना ,
देखो ... निहारो .... सरहाओ,
पनपा ... पला....सजा ...संवरा ,
देखो .... देखो .... अरे देखो तो सही ,
पसीजा .... दुलका .... लुढ़का ....झरा ,
छलका ....टप.... टप ...टप ... ||
जन्मा पलको पे एक हंसी सपना ,
देखो ... निहारो .... सरहाओ,
पनपा ... पला....सजा ...संवरा ,
देखो .... देखो .... अरे देखो तो सही ,
पसीजा .... दुलका .... लुढ़का ....झरा ,
छलका ....टप.... टप ...टप ... ||
वह देखो ... देखो अरे देखो तो ज़रा ,
जन्मा पलकों पे एक हंसी सपना ,
देखो.... निहारो ...सरहाओ ,
पनपा ...पला ...सजा ....संवारा ,
देखो ...देखो...अरे देखो तो सही ,
हुआ मजबूत ...पक्का...द्र्ढ...
प्रबल ...पुख्ता .....साकार ...||
जन्मा पलकों पे एक हंसी सपना ,
देखो.... निहारो ...सरहाओ ,
पनपा ...पला ...सजा ....संवारा ,
देखो ...देखो...अरे देखो तो सही ,
हुआ मजबूत ...पक्का...द्र्ढ...
प्रबल ...पुख्ता .....साकार ...||
Saturday, May 9, 2015
पहला प्यार
उफ़्फ़ ! क्या कहना ,
वो पहला प्यार ...
स्कूल की पिछली सीट पर पनपता ,
हिसाब के सवालो पे उलझता ,
हिन्दी की मात्राओं से झुझता ,
भूगोल की क्लास मे घूमता,
इतिहास को रटता - रटता ,
लाइब्रेरी की किताबों से झाँकता ,
अँग्रेजी की कविता को निगलता ,
आर्ट के पन्नो को रंगता ,
विज्ञान को उलटता - पलटता ,
पी टी सर से धमकता ,
केंटीन मे समोसे पे अटकता ,
उफ़्फ़ ! क्या कहना ,
पहला प्यार .....
Thursday, March 19, 2015
अनोखा प्यार
उस नाज़ुक ...मखमली हवा को ,
बाँके गबरू छैला से .....
न जाने कैसे जाने - अनजाने .....ही प्यार हो गया ।
वह करती उसका पीछा दिन औ रात
उसे सहलाती तो छेड़ जाती कभी,
बिखेरती उसके कदमों मे,
बेले - जुही - चम्पा की कलियाँ ।
कभी ले जा उड़ा अपने संग ,
गहरी - हसीन वादियों की बाहों मे ।
नौजवान भी दीवान उस पगली हवा का,
दोनों यथार्थ से परे , अपने मे ही मस्त ।
अपनी इस एन्द्र्जलिक दुनिया मे प्रसन्न,
पर किस्मत को था न मंजूर ....
पड़ गयी दुष्ट कुमारी की शौकीन नज़र ,
गबरू नौजवान के तन की और ,
नहीं कर पायी सहन बाँके का इंकार ....
उठवा लिया भेज लाम औ लश्कर
बेबस हवा बहुत चीखी और चिल्लाई ,
उखड़े पाँव सेना के घड़ी - दो घड़ी ,
पटका सिर ...हुई लुहलहान...किया पीछा ...
गुस्से से बौखलाई करती सब तहस - नहस ,
आग - बबूला प्रचंड बवंडर उठाती,
चीखती -- फुफकारती - गरजती ....
आज भी ढूंढती अपना सनम ..................@ पूनम
बाँके गबरू छैला से .....
न जाने कैसे जाने - अनजाने .....ही प्यार हो गया ।
वह करती उसका पीछा दिन औ रात
उसे सहलाती तो छेड़ जाती कभी,
बिखेरती उसके कदमों मे,
बेले - जुही - चम्पा की कलियाँ ।
कभी ले जा उड़ा अपने संग ,
गहरी - हसीन वादियों की बाहों मे ।
नौजवान भी दीवान उस पगली हवा का,
दोनों यथार्थ से परे , अपने मे ही मस्त ।
अपनी इस एन्द्र्जलिक दुनिया मे प्रसन्न,
पर किस्मत को था न मंजूर ....
पड़ गयी दुष्ट कुमारी की शौकीन नज़र ,
गबरू नौजवान के तन की और ,
नहीं कर पायी सहन बाँके का इंकार ....
उठवा लिया भेज लाम औ लश्कर
बेबस हवा बहुत चीखी और चिल्लाई ,
उखड़े पाँव सेना के घड़ी - दो घड़ी ,
पटका सिर ...हुई लुहलहान...किया पीछा ...
गुस्से से बौखलाई करती सब तहस - नहस ,
आग - बबूला प्रचंड बवंडर उठाती,
चीखती -- फुफकारती - गरजती ....
आज भी ढूंढती अपना सनम ..................@ पूनम
Saturday, January 31, 2015
वह कसूरवार
उसने चुराई सूरज से रोशनी,
फिर वह छाँव बन गयी ,
कभी आगे - कभी पीछे,
घटती - बदती बस यूं ही ,
उसके ही इर्द - गिर्द बस यूं ही ,
बिन कसूर भी बनी कसूरवार ,
कीमत चुकनी पड़ी भारी,
एक कतरा रोशनी के लिए।
अब वह भी बनना चहाती हाए सूरज,
जगमग - जगमग - धधकता,
पर अब अपनों को हाए इंकार ,
आदत जो हो गयी हाए तुम्हारी,
अहर घड़ी चक्करघिन्नी सी तुम,
अरे ! छोड़ो जाने भी दो ,
क्यों , बेकार मए करती हो
अपना समय बरबाद,
जब मिल रही मुफ्त की रोशनी ,
व्यर्थ ही हो रही परेशान,
तुम बस छाया हो ,
छाया ही बन कर रहो ,
आगे - पीछे - इर्द - गिर्द ,
गूंगी - बाहरी - बौनी बन,
स्याह - श्यामल परछाई सी,
वह कसूरवार ..........................
फिर वह छाँव बन गयी ,
कभी आगे - कभी पीछे,
घटती - बदती बस यूं ही ,
उसके ही इर्द - गिर्द बस यूं ही ,
बिन कसूर भी बनी कसूरवार ,
कीमत चुकनी पड़ी भारी,
एक कतरा रोशनी के लिए।
अब वह भी बनना चहाती हाए सूरज,
जगमग - जगमग - धधकता,
पर अब अपनों को हाए इंकार ,
आदत जो हो गयी हाए तुम्हारी,
अहर घड़ी चक्करघिन्नी सी तुम,
अरे ! छोड़ो जाने भी दो ,
क्यों , बेकार मए करती हो
अपना समय बरबाद,
जब मिल रही मुफ्त की रोशनी ,
व्यर्थ ही हो रही परेशान,
तुम बस छाया हो ,
छाया ही बन कर रहो ,
आगे - पीछे - इर्द - गिर्द ,
गूंगी - बाहरी - बौनी बन,
स्याह - श्यामल परछाई सी,
वह कसूरवार ..........................
Tuesday, December 16, 2014
उन मासूमों के नाम .......
.
देख तूने जो मागी थी पेसिल रंगीन ,
बाबा आज ही तेरे लिए लाये हें,
उठ .....भर दीवारों को कर चितकबरा ,....
नहीं ...नहीं टोकेगा कोई.....
तूने कल जो छुपाई दादी की ऐनक,
खेल ही खेल में, ढूंढती परेशान ....
आ ....चल जल्दी दे जा ,
तेरी उधड़ी पड़ी निक्कर की सीवन ,
सुई ले दादी हाथ में परेशान है ..........
दादा जी की टूटी पड़ी छड़ी ,
तूने कहा जोड़ेगा टेप से ,
देख लिए बैठे हाथों में ,
टकटकी बांधे दरवाजे पे , अब तो आजा ......
सुबह जल्दी - जल्दी मे प्लेट में छोड़ी,
अधखाई रोटी और लुढ़का दूध का ग्लास ,
अम्मा , हाथ मे लिए झाड़न खड़ी है ,
ठिठकी ...मूक.......अचेत .........................
बाबा .....अवाक....मौन.....
बस गूँजे कानों में एक ही आवाज़ ,
बाबा , इस बार छुट्टियों में चलेंगे कही दूर ...................बहुत दूर
नई सी जगह ......जहाँ न गया हो कोई ,
हाँ ...रे ...पगले जरूर ......अबकी बार ...........दूर ...
बहुत दूर.................
बाबा आज ही तेरे लिए लाये हें,
उठ .....भर दीवारों को कर चितकबरा ,....
नहीं ...नहीं टोकेगा कोई.....
तूने कल जो छुपाई दादी की ऐनक,
खेल ही खेल में, ढूंढती परेशान ....
आ ....चल जल्दी दे जा ,
तेरी उधड़ी पड़ी निक्कर की सीवन ,
सुई ले दादी हाथ में परेशान है ..........
दादा जी की टूटी पड़ी छड़ी ,
तूने कहा जोड़ेगा टेप से ,
देख लिए बैठे हाथों में ,
टकटकी बांधे दरवाजे पे , अब तो आजा ......
सुबह जल्दी - जल्दी मे प्लेट में छोड़ी,
अधखाई रोटी और लुढ़का दूध का ग्लास ,
अम्मा , हाथ मे लिए झाड़न खड़ी है ,
ठिठकी ...मूक.......अचेत .........................
बाबा .....अवाक....मौन.....
बस गूँजे कानों में एक ही आवाज़ ,
बाबा , इस बार छुट्टियों में चलेंगे कही दूर ...................बहुत दूर
नई सी जगह ......जहाँ न गया हो कोई ,
हाँ ...रे ...पगले जरूर ......अबकी बार ...........दूर ...
बहुत दूर.................
@ पूनम कासलीवाल
Tuesday, August 19, 2014
शब्दों का बिछड़ जाना.
सुनहली किरणों के स्पर्श से खुल जाते थे गुलों के लब,
उड़ते परागकणों की तरह निकल आते थे तुम..
तुम बिन बुलाए अक्सर आ जाया करते थे,
मगर अब ऐसा नहीं होता...
तुम्हीं तो ख्वाबों को कागजों पर शक्ल दिया करते थे,
कभी-कभी मूसलधार बारिश की बूंदों की तरह झरते थे,
और गीतों का सिलसिला बन जाता था।
हर लम्हा, हर जगह, हर शै में तुम कहीं न कहीं उभ्ार ही जाते थे ..
मगर न जाने क्यों और कहां गुम हो।
कलम करवट ही बदलती रहती है, किसी बिरहन की तरह....
कहां-कहां न तलाशा है तुम्हें,
किताबों के हर सफे से भी तुम नदारद ही नजर आते हो।
मेरी तन्हाइयों के दोस्त-मेरे शब्द।
कितना खुशगवार होता है शब्दों के साथ जीना
और कितना खामोश दर्द दे जाता है शब्दों का बिछड़ जाना.........
उड़ते परागकणों की तरह निकल आते थे तुम..
तुम बिन बुलाए अक्सर आ जाया करते थे,
मगर अब ऐसा नहीं होता...
तुम्हीं तो ख्वाबों को कागजों पर शक्ल दिया करते थे,
कभी-कभी मूसलधार बारिश की बूंदों की तरह झरते थे,
और गीतों का सिलसिला बन जाता था।
हर लम्हा, हर जगह, हर शै में तुम कहीं न कहीं उभ्ार ही जाते थे ..
मगर न जाने क्यों और कहां गुम हो।
कलम करवट ही बदलती रहती है, किसी बिरहन की तरह....
कहां-कहां न तलाशा है तुम्हें,
किताबों के हर सफे से भी तुम नदारद ही नजर आते हो।
मेरी तन्हाइयों के दोस्त-मेरे शब्द।
कितना खुशगवार होता है शब्दों के साथ जीना
और कितना खामोश दर्द दे जाता है शब्दों का बिछड़ जाना.........
Subscribe to:
Posts (Atom)