Sunday, February 6, 2011

business school mae dakhila

"आइए- आइए - आइए.....खुल गया नया बिजनिस स्कूल........... !!!


अपने बच्चे का एडमिशन यहाँ करवाइए ,

कुछ सालों में छल, कपट , फरेब से भरपूर ,

एक जीता - जगता पुतला ले जाइये


सहानभूति , नैतिकता , सदाचार , मूल्य ,

यह सब भारी - भारी शब्द बकवास हैं


सिर्फ पुरानी किताबों , या बुजुर्गों के मुंह

से टपकते खाली - खोखले अलंकार हैं


ये दे नहीं पाते रोटी के ऊपर का मक्खन ,

न जुटा पाते विदेश की यात्रा का लागत


हम नहीं करते यहाँ किसी में कोई भेद - भाव ,

थोक के भाव करते हैं तैयार आपका सामान


जालसाजी , धोखा , ढोंग ,हेराफेरी ,भ्रष्टाचार से

ठूंस - ठूंस कर विकसित किया है हमारा पाठ्यक्रम


हम ही उत्पन्न करते हैं अनावश्यक जरुरत ,

और हम ही जुटाते हैं उसकी उट -पटांग रसद


जी हाँ ! ईमानदारी , शुद्धता को रख कर ताक पर ,

छल - कपट का रचते हैं हम नया संसार


यही आज की संस्कृति ,यही है आज की पहचान ,

आइए- आइए कुछ ही जगह बची हैं बाकी ,

जल्दी जल्दी से अपने घर के चिराग को लाइए,

फिर उससे पूरा संसार जलवाइए .............................."



7 comments:

  1. पूनम जी,

    बहुत सुन्दर आज की शिक्षा पद्धति पर तेखा व्यंग्य......बहुत सुन्दर|

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  2. बहुत ही सटीक व्यंग.

    ईमानदारी , शुद्धता को रख कर ताक पर ,

    छल - कपट का रचते हैं हम नया संसार

    आपकी कलम को शुभ कामनाएं

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  3. बहुत अच्छी रचना,
    शिक्षा को व्यवसाय बना इन दुकानदारो पर अच्छा व्यंग्य है

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  4. aap sbhi ko bahut bahut dhanywaad...

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