Tuesday, March 5, 2013

सन्नाटे की आवाज़

क्या कभी सुनी है तुमने ,
सन्नाटे की आवाज़ ????एक ताल - लय - सुर है इसमे भी ,दिल को जो कर दे चाक ,वो टीस है इसमे ॥
 
भिगो दे भीतर तक ,वो रस-धार है इसमे ॥ जैसे अंधकार --- काला - गाढ़ा - घनघोर ..... पर भींच पलकें देखो ,इसमे भी अनेकों रंग ,गहरे - हल्के -स्याह - चितकबरे ,टिमटिमाते --- फुटते- अनेक सितारे ... करो बंद आँखें और देखो ... देखो तो सही ...
अजीब है न ?
चमकीला अंधकार ,सन्नाटे की आवाज़ ,या फिर सही है न ..... ?

Wednesday, February 27, 2013

वह अलग सा कस्बा




पहाड़ी की तलहटी वाला वह कस्बा ,
बहुत अलग था , सबसे अलग ,
उस शहर के ऊपर मंडराया करती ,
तरह -तरह की विभिन्न प्रकार की चिड़ियाँ ।

उस कस्बे की सबसे ऊँची चोटी पर ,
रहता सफ़ेद - लंबी दाड़ी वाला बाबा ,
रस्यमयी - मायावी  -  चमत्कारी ,
काले से भी काले  जादू का मालिक ,
बदल दे मंत्र से किसी को कुछ भी ।

देखा है अक्सर नीले - स्यहा बदन वाली ,
हर आकार - प्रकार की औरतों को ,
शाम के झुटपुटे मे उन घुमावदार रस्तों पे चढ़ते ,
अगले दिन एक और चिड़िया की संख्या बढ़ जाती ,
मुक्त हो जाती उस दर्दनाक जिंदगी से ,
बस नहीं छोड़ पाती अपने कस्बे का मोह ,
इसलिए खुली हवा - धूप मे वहीं मंडराती ।

Monday, February 25, 2013

दो मदहोश निगाहें ...


 घर की बालकनी पर अधटंगे ,
सिगरेट का कश लगा ,
छल्लो के साथ - साथ ,
कुछ - कुछ मुझे भी फूंकते हुये ,
चाँद की ओर मुंह कर ,
एक गहरी सोच मे डूबते हुये ,
दार्शनिक मुद्रा मे शायद ,
वह मुझे ही देखता होगा .... 

उसे क्या पता ,
दूर कहीं एक पागल - सी ,
सिरफिरी लड़की , 
दुनियादारी से अनजान ,
अक्सर तपती दुपहरी मे ,
नंगे पाँव छत पर ,
पैरों को अदल - बदल ,
करती है चाँद का इंतज़ार ,
लोगों को दिखे दादी या चरखा ,
वह तो ताके दो मदहोश निगाहें ...

Sunday, February 24, 2013

कमबख्त मुझे भी हो जाता है ।♥

प्यार अक्सर गाहे - बाहे छू कर निकल जाता है,
कभी गालिब के शेरों मे या तोता - मैना के किस्सों मे ,
रफी की दिलकश आवाज़ मे या लता की सुरलहरी मे ,
गुलज़ार के रोमानी शब्दों मे या अख्तर साहब के जादुई कलाम मे ,
गुनगुनाते हुये या पढ़ते हुये ,इतना तारतम्य हो जाता है ,
प्यार होता किसी और का है , करता कोई और है ,
पर हर बार कमबख्त मुझे भी हो जाता है , 
पर हर बार कमबख्त मुझे भी हो जाता है ।♥ ♥

Thursday, February 21, 2013

तब से यही हूँ .... यहीं हूँ


नहीं नहीं नहीं ....बस यही बुदबुदा रही थी 
बस मत पलटना ,
मत मूड कर देखना ,
मै न जा पाऊँगी ,
पर तुम तो हमेशा से रहे जिद्दी ,
मेरी सुनी कब जो अब सुनते ,
आखिर जाते- जाते पलट ही गए ,
हल्की सी चोट्टी हंसी और एक उंगली का इशारा ,
पलट कर , कर ही गए ,
देखो , अब न जा पाऊँगी ,
देखो तब से यही हूँ .... यहीं हूँ

Sunday, February 17, 2013

अब उसे सिरफिरे होने पे भी कोई एतराज नहीं ....

सिरफिरी और पागल घोषित किया गया उसे ,
वह आज सोचने जो लगी ,
वह आज बोलने जो लगी ,
वह आज विरोध जो करने लगी ,
वह आज तय जो करने लगी ,
वह आज चयन जो करने लगी ,
वह आज फैसले जो लेने लगी ॥ 

लीक पर चलो ,
ठोक- बजा कर ,
पूरी कायवाद कर,
अपने इस्तेमाल के लिए ,
लाये थे तुम्हें ।
जितना हो जरूरी ,
उतना ही बोलो ,
जब तक हम न कहे ,
जहाँ हो वहीं चिपकी रहो ,
वैसे भी तुम तो न घर की हो घाट की ,
तुम्हारा नाम भी तो अपना नहीं ,
न कोई पहचान ,
क्या भर सकती हो कोई भी कागज- पत्तर,
हमारे दिये नाम के बिना ,
जब नहीं तुम्हारा कोई अस्तित्व ,
तो फालतू मे इतना शोर क्यों करो ,
जाओ जाकर कुछ पोंछो ,
कुछ साफ करो ॥

पर वह क्या करती ,
उसके सिर के चारों तरफ ,
जैसे कुछ उग आया था ,
जो दिखता तो नहीं ,
पर हर पल - हर घड़ी ,
उसे कौंचता रहता ,
उसे उकसाता - बहकता ,
पगली ! मत आ इस छलावे मे ,
तू भी एक शरीर -एक आत्मा है,
बरसों से कुचली  गयी ,
रक्त -रंजित- उपेक्षित ,
अब न कर देर ,
कर आज़ाद अपने को ,
विभित्सित इन विचारों से ,
तेरा पागलपन कहीं भला है .,
इसलिए, अब उसे सिरफिरे होने पे भी कोई एतराज नहीं .....

Wednesday, February 13, 2013

तू मेरी सोनी, मै तेरा माही .....



एकदम अछूती , परी सी ,
सारी उपमाओं से परे ,
ऐसी थी  वो बेमिसाल ।
देख - देख उसे आहें भरते ,
आने - जाने वाले बेशुमार ।

अपनी धुन में ,वह मतवाली ,
इन सब से बातों से अनजान ।
उन सब मतवालों मे ,वह भी था ,
आशिक उसका ,मामूली सा एक इंसान ।
आते -जाते उसको ताके ,
पर न कर पाये इज़हार।

एक दिन कर मन को पक्का ,
रोक उसे धीरे से बोला,
करता हूँ मै ,तुझसे प्यार ,
तू मेरी सोनी ,मै तेरा महिवाल ।

तमक कर बोली ,
जा - जा पहले देख अपनी औकात ,
तेरे जैसे कितने घूमे ,
आईना मे देख अपनी शक्ल ,
नहीं मेरी जूती के लायक ,
बड़ा चला बनने महीवाल ।

हो मायूस ,दर से लौटा ,
टूटा दिल औ बहकी चाल,
फिर न आया उसकी चौखट ,
बीत गए दिन और साल ।

जन्मदिन पर अपने ,
पौड़ी पे पाया उसने रंगबिरंगा
लिपटा सुंदर सा एक उपहार ।
खोला उसे लपक कर,
निकली जूतियाँ नक्काशीदार ,
मुलायम - सुंदर  - अनमोल ,
लगा उन्हे सीने से झूमी ,
आई एक नाज़ुक सी आह ।

विस्मित सी हुई ,
सिर झटक पहनी पैरों मे,
रखा जैसे ही ज़मीं पे पाँव ,
करहाती सी आई आवाज़ ,
तू मेरी सोनी , मै तेरा महीवाल ।

हुई अवाक, सोचे कहाँ से ,
आए ये बार - बार आवाज़ ,
कोई भी तो नहीं यहाँ पर ,
होगा कोई वहम - शहम,
पर लगे एक जानी - पहचानी सी बात ।

ज्यों - ज्यों वह कदम उठाए ,
गूँजे फिर फिर वही आवाज़ ,
तू मेरी सोनी मै तेरा महिवाल,
पगला गयी - बौखला गयी ,
ढूँढे  घर के हर द्वार ,
नही मिला जब कोई उसको ,
लांघ गयी दलहीज ,
भागे गली - चौराहे ,
पार किए सब नदी व ताल ,
नाद बस यही ,तू मेरी सोनी -मै तेरा माही ।

कहते है आज भी जंगलों मे अक्सर ,
दौड़ती - भागती - सिसकती ,
टकराती पेड़ों - पत्थर से  ,
पथराई आंखो से ढूँढे ,
अनहद करती वही आवाज़ ,
" तू मेरी सोनी , मै तेरा माही " ,
तू मेरी सोनी , मै तेरा माही .....!!!!!!