Sunday, May 16, 2010

Maa

माँ
लोरी , थपकी
पल्लू , चवन्नी
दाल , छोंक
मलहम , पट्टी
डांट , फटकार
लुकाछिपी , खिखिलाहट
चाय की भाप ,
स्वेटर के फंदे ,
फ़ॉर्क की तुरपन ,
धमकी , नसीहत ,
समस्या  का हल ,
दोस्त तो कभी जासूस ,
समय की घडी ,
अगरबत्ती की खुशबू,
गुड और चना ,
गाजर का हलवा
अचार की फांक
जादू की पिटारी

माँ..माँ...माँ..

Friday, May 14, 2010

Band Khidki

काफी अरसे के बाद बंद खिड़की खुली ,
तन मन को हर्षित कर गयी .
यादो की पिटारी जो कब से सहेज रखी थी ,
परत दर परत खुल गयी .
घास ,फूल , धूप की महक ,
हर कोने को छू गयी ,
खिलखिलाना ,मनाना, रूठ जाना ,
सब यादे तरोताजा हो गयी .
बड़ा लम्बा सफ़र है यह ,
मुड़ कर देखा तो पाया .
एक उम्र पीछे छोड़ आये है हम .

इति

Sunday, May 9, 2010

dayra

कितने दायरे में बंधे है हम |
दायरे , जो खींचे है स्वय हमने,
अपने चारो ओर |
दायरा , टूटते ही ,
मच गया शोर ,
चारो ओर |
उठने लगी निगाहे ,
तीखी , बेधती सी |
ये उठती निगाहे ,
धकेल देती है ,
वापिस अपने दायरे की ओर |
दायरे,  जो बनते जा रहे है ,
दलदल |
ओर हम धंसते जा रहे है ,
गहरे ,
छटपटआते ,
अवश |
..........................

Friday, May 7, 2010

audhre sapne

एक टुकड़ा धूप,
थोड़ी सी छाँव.
ज्यादा तो नहीं चाहा,
पर पूरी न हुई .
जिन्दगी इसी का नाम है .
अधूरे ही सही कुछ सपने ,
पूरे तो हुए .

Thursday, May 6, 2010

Sunday, March 7, 2010

slib

सलीब
हम सब टंगे  है  अपनी - अपनी सलीब पर
ईसा को तो , ठोका था औरो ने ,
हम मजबूर स्वयं को ठोकते है |

औरो ने ठोका  तो आप महान ,
और हम खुद ही टंगे , तो मात्र मानव?
.......................

Friday, February 19, 2010

kahi - ankahi

कही - अनकही
परिपूर्ण  , फिर भी शुन्य .
दूर ,फिर भी  अन्तस्थ .
गहन , फिर सूक्ष्म .
संचित , फिर भी हीन.
अमूल्य , फिर भी नगण्य .
भरपूर फिर भी रिक्त .