यह आधा - अधूरा सपना मेरा ,
अक्सर मुझे रातो को जगाता है |
तुम्हारे आस पास होने का भ्रम ,
मुझे चक्रव्यूह सा भरमाता है |
ब़ार - ब़ार छूती हूँ माथे की लकीरों को ,
जहाँ छुआ था तुमने ,
वह गर्म अहसास अभी भी मुझे ,
अग्निशिखा सा जलाता है |
इति ..............
Wednesday, June 16, 2010
Sunday, May 16, 2010
Maa
माँ
लोरी , थपकी
पल्लू , चवन्नी
दाल , छोंक
मलहम , पट्टी
डांट , फटकार
लुकाछिपी , खिखिलाहट
चाय की भाप ,
स्वेटर के फंदे ,
फ़ॉर्क की तुरपन ,
धमकी , नसीहत ,
समस्या का हल ,
दोस्त तो कभी जासूस ,
समय की घडी ,
अगरबत्ती की खुशबू,
गुड और चना ,
गाजर का हलवा
अचार की फांक
जादू की पिटारी
माँ..माँ...माँ..
लोरी , थपकी
पल्लू , चवन्नी
दाल , छोंक
मलहम , पट्टी
डांट , फटकार
लुकाछिपी , खिखिलाहट
चाय की भाप ,
स्वेटर के फंदे ,
फ़ॉर्क की तुरपन ,
धमकी , नसीहत ,
समस्या का हल ,
दोस्त तो कभी जासूस ,
समय की घडी ,
अगरबत्ती की खुशबू,
गुड और चना ,
गाजर का हलवा
अचार की फांक
जादू की पिटारी
माँ..माँ...माँ..
Friday, May 14, 2010
Band Khidki
काफी अरसे के बाद बंद खिड़की खुली ,
तन मन को हर्षित कर गयी .
यादो की पिटारी जो कब से सहेज रखी थी ,
परत दर परत खुल गयी .
घास ,फूल , धूप की महक ,
हर कोने को छू गयी ,
खिलखिलाना ,मनाना, रूठ जाना ,
सब यादे तरोताजा हो गयी .
बड़ा लम्बा सफ़र है यह ,
मुड़ कर देखा तो पाया .
एक उम्र पीछे छोड़ आये है हम .
इति
तन मन को हर्षित कर गयी .
यादो की पिटारी जो कब से सहेज रखी थी ,
परत दर परत खुल गयी .
घास ,फूल , धूप की महक ,
हर कोने को छू गयी ,
खिलखिलाना ,मनाना, रूठ जाना ,
सब यादे तरोताजा हो गयी .
बड़ा लम्बा सफ़र है यह ,
मुड़ कर देखा तो पाया .
एक उम्र पीछे छोड़ आये है हम .
इति
Sunday, May 9, 2010
dayra
कितने दायरे में बंधे है हम |
दायरे , जो खींचे है स्वय हमने,
अपने चारो ओर |
दायरा , टूटते ही ,
मच गया शोर ,
चारो ओर |
उठने लगी निगाहे ,
तीखी , बेधती सी |
ये उठती निगाहे ,
धकेल देती है ,
वापिस अपने दायरे की ओर |
दायरे, जो बनते जा रहे है ,
दलदल |
ओर हम धंसते जा रहे है ,
गहरे ,
छटपटआते ,
अवश |
..........................
दायरे , जो खींचे है स्वय हमने,
अपने चारो ओर |
दायरा , टूटते ही ,
मच गया शोर ,
चारो ओर |
उठने लगी निगाहे ,
तीखी , बेधती सी |
ये उठती निगाहे ,
धकेल देती है ,
वापिस अपने दायरे की ओर |
दायरे, जो बनते जा रहे है ,
दलदल |
ओर हम धंसते जा रहे है ,
गहरे ,
छटपटआते ,
अवश |
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Friday, May 7, 2010
audhre sapne
एक टुकड़ा धूप,
थोड़ी सी छाँव.
ज्यादा तो नहीं चाहा,
पर पूरी न हुई .
जिन्दगी इसी का नाम है .
अधूरे ही सही कुछ सपने ,
पूरे तो हुए .
थोड़ी सी छाँव.
ज्यादा तो नहीं चाहा,
पर पूरी न हुई .
जिन्दगी इसी का नाम है .
अधूरे ही सही कुछ सपने ,
पूरे तो हुए .
Thursday, May 6, 2010
Sunday, March 7, 2010
slib
सलीब
हम सब टंगे है अपनी - अपनी सलीब पर
ईसा को तो , ठोका था औरो ने ,
हम मजबूर स्वयं को ठोकते है |
औरो ने ठोका तो आप महान ,
और हम खुद ही टंगे , तो मात्र मानव?
.......................
हम सब टंगे है अपनी - अपनी सलीब पर
ईसा को तो , ठोका था औरो ने ,
हम मजबूर स्वयं को ठोकते है |
औरो ने ठोका तो आप महान ,
और हम खुद ही टंगे , तो मात्र मानव?
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