Sunday, May 22, 2011

बुढ़िया की पोटली

बीच चौराहे बैठी बुढ़िया ,
डाले अपनी छोटी सी टपरी |
बेच रही थी छोटी -बड़ी ,
हलकी - भारी कुछ पोटली |
ले लो- ले लो लेने वालो ,
अपने सुख- दुःख की गठरी |
बुढ़िया की थी साफ़ हिदयात ,

खोल कर देखना है मना
जितना भी  तुम्हे मिला है ,
उसको लेकर मग्न रहो |
सब अपना सुख छाँट रहे थे ,
कनखियों से दूजे को आँक रहे थे |
दाब रहे थे अपना सुख पर ,
ताक रहे थे दूजे का दुःख |
हर कोई पोटली खींच  रहा था ,
एक दूजे पर खीज रहा था |
अब सब अपनी गठरी ले घूम रहे हैं ,
लगती भारी जो कभी प्यारी थी बड़ी |
अब भी नजर दूसरे की पर ही है गढ़ी,
यही गठरी है क्यों  मेरे गले  पड़ी |
काश ली होती मैने भी वही ,
क्यों नहीं देखा मैने पहले सही |
बुढ़िया की टपरी अब भी वहीं है ,
लिखा है  - बिका हुआ माल वापिस नहीं होता ..!!!



Monday, May 16, 2011

पहली बार

पहली बार ऐसा हुआ है ,
हवा ने हल्के से छुआ है |
चरमराते सूखे पत्तो में भी ,
हो रहा संगीत का एहसास |
चिलचिलाती संगीन धूप भी ,
बन गयी मधुमयी शाम ख़ास  |
हल्की - तेज़ रिमझिम सी  बूंदें ,
करा रही  तेरी छुअन का आभास |
उड़ाती हुई यह गर्द धूल भी ,
आलिंगन बन  गयी आस - पास |
पहली बार ऐसा हुआ है ,
हवा ,धूप , बूंदे सब छू गई एक साथ ..
पहली बार ....पहली बार ...!!!!





Monday, May 9, 2011

teri yaad

पलकों की चिलमन से निकल कर ,


गालों की सेज पर ठहर गया ...

तेरी याद में अटका आसूँ,

रुकते - रुकते भी बह गया .....

दिल में दर्द है यह प्यार का मीठा सा ज़रा ,

ज़माने कि हवा लगते ही खारा कैसे हो गया ..........

Sunday, May 1, 2011

adat

गाल पर हाथ रख ,मुस्कुराते हुए ,

उसने कहा.......
अब तुम्हारी आदत सी हो गयी है
तो हमने भी मुस्कुरा कर यही कहा ...
न हूँ मैं सुबह की भाप उड़ाती एक प्याला चाय ,
न रबरबैंड में लिपटा बरामदे में फेंका अखबार ,
ऐसा भी तो कह सकते थे ....
अब तुम्हारा साथ अच्छा लगता है ,
बिन बात यूँ ही खिलखिलाना ,
कुछ कहते - कहते रुक जाना ,
एक साथ बोलना या ,
अचानक चुप हो जाना ,
बस एकटक देखना
क्या है जो यकायक ,
रोक देता है...
क्यों नहीं कह पाते,
मन की परतों मे है जो दबा ,
कुछ अनकहा - अनछुआ सा ,
जो हमेशा हवा में टंगा रह जाता है ,
या फिर अगली मुलाकात की ,
पृष्ठभूमि बन जाता है .....!!!!!!

Monday, April 25, 2011

kab tak

कब तक रहोगे ख्वाब की तरह ,
कभी तो सामने आओ हकीकत की तरह |
कब तक रहोगे दूर सितारे की तरह ,
कभी तो मिलो बहती हवाओ की तरह |
कब तक रहोगे पलकों में नमी की तरह ,
कभी तो छलको रेशमी बूंदों की तरह |
कब रहोगे एक गूढ़   सवाल की तरह ,
कभी तो आओ सुलझे  जवाब की तरह |

Tuesday, April 19, 2011

tum kya jano ?

हैरान ही कर दिया था ,
मैने अपनेआप को ..
जब हम थोड़ा करीब आए थे |
तुम्हारी वो गुलाबी मुस्कान ,
एक युग सा समेटे उस पल में ..
मुझे ताकती वो मद निगाहें ,
बाहुपाश मे बेल सी लिपटी में ..
बादल बन भिगो गए तुम |
बड़ी हिम्मत से तय किये मैने,
ये चन्द कदम करीबी के ..
तुम क्या जानो ......!!


Saturday, April 16, 2011

sapne

सपने सभी देखते हैं ,
कुछ सुबह होते ही ....
ओस की बूंद से पल में  ....
आँखों से धुल जाते हैं |
कुछ कोरों मे अटके ....
किरकिरी सी बन.....
पूरा दिन सताते हैं |
कुछ जुगनू की तरह ...
हरदम टिमटिमाते हैं ...
हौले - हौले से गुदगुदाते हैं |