Sunday, February 16, 2014

रचती अपना आज ...कल.....काल ...

वह नहीं सह पाई ताप ,
तेरी जुदाई का ,
निकल पड़ी नंगे पाँव,
ठंडी - जलती बर्फ पे ,
भागती - दौड़ती ,
निकलता धुआँ तलवों तले ,
सिसकी - आहों से सर्द होंठ ,
जमती लकीरें जर्द गालों पे ,
 यादों - वादों की बनती पगडंडियाँ,
ऊबड़ - खाबड़ ,खोती शून्य में....
बनती लहू की टेड़ी- मेड़ी डगर ,
छिलती खाल-  झिल्ली - मांस ,
बनाती - उकेरती अद्भुत नक्काशी ,
रूखी - कठोर - भावशून्य - जमीन पर ...........
रचती अपना आज ...कल.....काल .........!!! 

Tuesday, January 21, 2014

बहुत पहले ...

बहुत- बहुत...........-
बहुत पहले ...........
जितना सोच सको उससे भी पहले की बात ...
.तब नहीं पता था किसी को ,
कि क्या होता है समय ,
क्या होता है हिसाब - किताब ,
न कोई गिनता था ,
न कोई रखता था ,
न ही कहता था , नही है समय मेरे पास ...........
न थे दिन , महीने , साल ,
न पल , क्षण, घंटो का का सवाल ,
न घड़ी - घंटे और टन- टन करते घड़ियाल ,
तब --हाँ - हाँ तब भी चलता था ,
सब कुछ , होता था सब कुछ ,
अपने - आप .....
फिर चढ़ गया एक फितूर ,
इंसान रखने लगा हिसाब ,
गिनने लगा सब कुछ ,
पहाड़ - पत्थर , धरती - आकाश ,
ढलती - चढ़ती छाया का हिसाब ,
घटा- जोड़ - गुणा- भाग ,
बस तब से ------- तब ही से ,
डरने लगा , डरने लगा ,
आतंकित .................बिकने लगा .......



Friday, December 27, 2013

सुनो ...सुनो न ...

सुनो , वो नर्म कतरे अपनी साँसो के ,
छोड़े थे जो गर्दन के पीछे ,
ठीक दाएँ कान के नीचे ,
आज भी सुलगते हैं..........................
सुनो , वो नमकीन से बोसे ,
छोड़े थे जो कोरों पर ,
ठीक बाएँ तिल के नीचे ,
आज भी थिरकते हैं ..................
सुनो , वो नाज़ुक सी छुअन ,
कंधे से हौले से सरकती ,
ठीक हथेली की दलहीज तक ,
आज भी झूर झुराती....सिहराती है.....................सुनो ...सुनो न ...

Sunday, September 29, 2013

हार गई हूँ .....गई हूँ हार .....!!!!!!!!!!!!

सुनो याद है न ,
वह छुपनछिपाई का खेल ,
बहुत पहले कभी बचपन मे ,
खेला करते थे हम - तुम ,
कंटीली झाड़ी, टेड़ी-मेड़ी चट्टान ,
बरसों खड़ा बूढ़ा बरगद का पेड़,
उसकी लटकती अंधेरी दाड़ी..... 
हर बार तुम नया ठिकाना ,
पता नहीं कैसे ढूंढ लेते थे तुम, 
मैं पगली - सिरफिरी - झींकती ,
खीजती - सुबकती ढूँढती - फिरती ,
पुकारती ज़ोर - ज़ोर से बार - बार ,
तेरा नाम .............................
मैं हार गई , सुनो हार गई हूँ मैं ,
अब तो बाहर आ जाओ न , सुनो ,
कहीं छुपे तुम शायद देख रहे मुझे ,
ले रहे मज़े मन ही मन मेरी अकुलाहट का ,
धम्म से कूद पड़ते अचानक ,
मैं बरसाती मुक्कियाँ तुम्हारी छाती पे ,
रोते - रोते लगातार बार - बार ,
जाओ नहीं खेलूँगी कभी तुम्हारे साथ ....
कभी नहीं ....कभी भी नहीं .......
तुम खींच चोटी मेरी , पकड़ अपने कान ,
अरे , पगली , खेल है न यह ,
तू तो यूं ही रूठ जाती है , रुदाली ............
फिर बना सरकंडो का ताज ,
रख सिर मेरे , कहते ,
अब मान भी जाओ , महारानी ............
खिलखिला , सब भूल - भाल ,
मान जाती हर बार ,
सुनो , सुन रहे हो न ,
आज फिर से खेल रहे तुम वही ,
पुराना बचपन का खेल ,
डरती , कांपती , सुबकती ,
पुकारती तुम्हारा नाम , बार - बार ,
मैं हार गई , सुनो हार गई हूँ मैं ,
गूँजती मेरी ही आवाज़,
सुनती हूँ टकराती ,
दीवारों , दरवाज़े,खिड़की ,
हवा , पानी, आसमान से ,
हार गई हूँ मैं , मैं गई हूँ हार ................ हार गई हूँ .....गई हूँ हार .....!!!!!!!!!!!!

Wednesday, September 18, 2013

एक पल

एक पल मे कितनी साँसे ,
कितनी साँसों मे कितनी धड़कन ,
कितने धडकनों मे तेरा नाम .....
गिनो ...सुनो,.... गिनो न..................!!
एक छन मे कितने लम्हे ,
हर लम्हे मे कितने सपने ,
उन सपनों मे भी सपने ,
हर सपने मे तेरा नाम ,
गिनो ...सुनो ,...गिनो न.............!!
 

Sunday, September 8, 2013

कह दो फिर से

सुनो , वो तुम ही थे न 
जो जीते - मरते थे मेरे लिए ,
कहते, जीता हूँ बस तेरे लिए ,
मेरी साँसो का हर तार जुड़ा है तुझसे ,
मेरी धड़कन का हर साज बस तेरे लिए ,
मेरी नज़रों की रोशनाई है तू ,
मेरे जीने का वजह है तू ...... 
एक बार नहीं , बार यही कहते थे ....कहते थे न ?
आज ..... 
ज़िंदा है जिस्म ,
मुर्दा गयी है रूह ,
क्यों नहीं आते तुम,
कहने वही बार - बार .......
मैं शायद जी जाऊँ ,
आ जाए कुछ जान ,
अटकी है मुट्ठी भर साँसे ,
बस तेरा ही है इंतज़ार .......
कह दो फिर से वही जो कहते थे बार - बार .......

Saturday, September 7, 2013

मेरा - तेरा बचपन

अतीत का वह पहला पन्ना ,
कितना सुखद , कितना भोला ,
न कोई चिंता न ही कोई फिकर ,
दोस्तों के संग बस धौल - धप्पा .... 
बारिश की बूंदों के संग - संग ,
छत पर जम कर खूब उछलना,
उड़ती पतंग के संग - संग ,
आसमान मे ऊंचे ही ऊंचे उड़ना ,
बना हवा मे महल और बुर्जी ,
पारियों के संग खूब विचरना..... 
माँ की आवाज़ को कर नाकारा,
गली मे रात होने तक खेलना ,
खाना - पीना किसीके भी घर,
अपना ही हो यह कब सोचना ,
घुटने की चोट पर धोती के कतरन ,
हल्दी - चूने का टपकता लेप ,
फिर भी करना जम कर हुड़दंग ,
अतीत का वह पहला पन्ना ,
कितना सुखद ...कितना भोला ......मेरा - तेरा बचपन .....!!!