दो - चार सांसे हम भी लेलेते हैं ,
हल्का सा दुःख हो तो रो लेते है ,
न मिले मर्ज़ी का तो झल्ला जाते हैं ,
हो मर्ज़ी का तो हँस लेते हैं ,
कभी दावत - कभी उत्सव ,
हम भी शामिल हो लेते हैं ..
नहीं सह पाते कष्ट - विघ्न ,
ईश्वर की शरण ले लेते हैं ,
नही टली जो मुसीबत ,
उसको ही दोषी कह लेते हैं...
उसकी मर्ज़ी मान घुट घुट कर जी लेते हैं ...
पर हम मे से ही कुछ विरले ,
सबसे अलग होते हैं ,
अपने दर्द को नया आयाम देते हैं ,
बन कर एक जीवंत उदारहण,
दुनिया को नयी दिशा देते हैं .
कोटि - कोटि है नमन उसे ,
जिसने नया यह मार्ग दिखाया ,
दुखी और हताश ह्रदय को जीने का विश्वास दिलाया...