Sunday, March 18, 2012

जीवन जीना कोई इनसे सीखे (कैंसर पीड़ित एक दोस्त को समर्पित )


दो - चार सांसे हम भी लेलेते हैं ,
हल्का सा दुःख हो तो रो लेते है ,
न मिले मर्ज़ी का तो झल्ला जाते हैं ,
हो मर्ज़ी का तो हँस लेते हैं ,
कभी दावत - कभी उत्सव ,
हम भी शामिल हो लेते हैं ..
नहीं सह पाते कष्ट - विघ्न ,
ईश्वर की शरण ले लेते हैं ,
नही टली जो मुसीबत ,
उसको ही दोषी कह लेते हैं...
उसकी मर्ज़ी मान घुट घुट कर जी लेते हैं ...
पर हम मे से ही कुछ विरले ,
सबसे अलग होते हैं ,
अपने दर्द को नया आयाम देते हैं ,
बन कर एक जीवंत उदारहण,
दुनिया को नयी दिशा देते हैं .
कोटि - कोटि है नमन उसे ,
जिसने नया यह मार्ग दिखाया ,
दुखी और हताश ह्रदय को जीने का विश्वास दिलाया...


Monday, March 12, 2012

कलाकार

वह एक कलाकार की भांति चित्र बनती है ,
रंग - तुलिका और कागज की बजाय ,
जनता के समक्ष खुद को सजाती है 
कुछ मित्रों के मध्य ,बिन बात मुस्कराती है ,
उसकी स्मित रेखा ज़्यादा ही खिच जाती है 
दो - चार लोगो के बीच, गंभीर हो जाती है ,
हल्के से सिर हिला दुनिया की चर्चा कर जाती है 
अन्य परिजनों के बीच शर्मीली -शांत मूक रह जाती है ,
उसकी मौजूदगी ही वहां से नज़रंदाज़ हो जाती है 
लोकप्रिय होना चाहती है ,घुल - मिल जाना चाहती है 
समान बनाना चाहती है ,साबित करना चाहती है 
उसे देख सब उसकी तरह ही बनाना चाहती है 
कितना अपनापन ,सामंजस्य और उन्मुक्तता ,
पर अक्सर एकांत मे वह अपने से ही करती है, 
एक सवाल बार - बार ....
कौन हूँ मैं.....मैं हूँ कौन ??????

Thursday, March 8, 2012

गुजर गया

उमड़ा, गरजा , बरस गया ...
अबके सावन भी गुजर गया ..
न गुनगुनायी आंगन मे भोर ..
न उठा झूले का शोर ..
न गोरी सजी ,
न पायल बजी ,
न चूमा माथा ,
न मिला आशीष,
न केश बिखरे ,
न नाइन के नखरे ,
न महका घेवर ,
न तले अंदरसे ,
न बाबुल का संदेसा ,
न भाई का इंतजार ,
अबके सावन भी गुजर गया .....


Monday, March 5, 2012

छोड़ो न .

चलो बीच से ही शुरू  करते हैं ,
छोड़ो न शुरू से शुरू करने की बात ,
जहाँ छूट गया था सिलसिला ,
उसका अब क्या  करना गिला .....
तेरी - मेरी उन बातों का ,
उन हंसी मुलाकातों का ,
चाँद  - तारों की रातों का ,
चलो बीच से ही शुरू करते हैं ,
छोडो न शुरू से शुरू करने की बात ......
.वक़्त है कहाँ पीछे मुड़ने का ,
तुमने क्या कहा ,
मैने क्या सुना ,
उलहानो- तानों से दूर ,
अपेक्षाओं - उपेक्षाओं से परे ,
अहं- अभिमान से वर्जित ,
तेरे - मेरे प्यार से सुसज्जित ,
चलो बीच से ही शुरू करते हैं ,
छोड़ो न शुरू से शुरू करने की बात ......छोड़ो न .....





Sunday, March 4, 2012

जागते रहो ...जागते रहो ...
आवाज़ लगता रामदीन ......
चक्कर लगता पूरी कालोनी का रात भर....
सुनता है आवाज़ टी० वि० की ..
तडकते -  भड़कते विज्ञापन,
चीखते - चिल्लाते गाने ,
कही से आती  खनखनाती हंसी ,
तो कहीं डरी - सहमी सी फुसफुसाहट ,
बच्चे के रोना दे रहा सुबूत अपने होने का कहीं ,
इधर है झगड़ा  और गाली -गलौज का शोर ,
लगा कर पूरा एक घेरा ,
रुक गया लोहे के फाटक के पास ,
चिपका है दीवार पर  "छोटा परिवार ,सुखी परिवार "
चमचमाता - रंगीन - खिलखिलाता बड़ा- सा पोस्टर ..
घूम जाता है आँखों के आगे 
पीली पत्नी ... बिलबिलाते बच्चे ..
खांसता बाप औ कर्कशा माँ.........
रुक पल भर ...घूरता है .....
झटक सर फिर ..
घूमने लगता है बार बार उसी बने बनाये चक्कर में......
जागते रहो ......जागते रहो .......!!!!!

Sunday, February 19, 2012

तुम्हारा अहसास

बादलों की झिर्रियों से छन के आती कोमल  धूप,
बदन पे फैली जैसे हो तेरा कुनकुना स्पर्श .
अलसा गए हम हल्की सी श्यामवर्णी गर्माहट से ,
लपेट ली अपनी ही बाहें कसके अपने ही आप से ,
और लजा गए तेरे मरमरी अहसास से ..............


Tuesday, February 14, 2012

तुम्हारे होने का इंतजार ..

खींच हथेली मेरी , ऊँगली से अपनी ,
हल्के से लिखा तुमने अपना नाम .
ढांप अपनी दूजी हथेली से उसे ,
बैठी रही इसे मैं अपना मान .
धीरे से खोल उसे देती रही दिलासा ,
हो तुम यहीं-कहीं मेरे आस- पास .
खुली आँखों में सजा बैठी सपना ,
और करने लगी कल्पना से प्यार .
ख्वाब  भी था आशिक मनचला,
वक़्त-बेवक्त करने लगा परेशां ,
भींच हथेली गालों पे टीका,
करती रही तुम्हारे होने का इंतजार ....