Tuesday, December 13, 2011

धूल

माना की तेरी नज़र में  मेरी कोई औकात नहीं ,
राह मे बिखरी धूल ही सही ,
मत भूल हवा की मनमानी ,
किरकिरी बन पड़ गयी तो ,
आँख मलता रहेगा ,
ता उम्र यूँ ही ...

Saturday, December 10, 2011

pravah

तुम्हारी पेशानी पर झलकते ,
स्वेद - बिन्दुओ को ,'
आँचल मे सह्जेने को जी चाहता है

जी चहता है ,
स्वेद - बिन्दुओ के हेतु
सिमट आए मेरे आँचल मे ,
तो यह आँचल सार्थक हो

तुम्हारे राज में हमराज बन
खो जाने को जी कहता है

जी कहता है ऐसे ही खो जाने से
महामिलन की अनुभूति ,
प्राप्त हो मुझे भी एक ब़ार

पलको पर घिर आए ,
तुम्हारे इस गीलेपन को
पी जाने को जी कहता है

जी कहता है
और यह प्रयास
बन जाए प्रतीक
हमारे अनंत में खो जाने का

तुम और में का विभाजन
समाप्त कर ,
तुम से मे , में कहलाऊ
जी कहता है
इति.....................

Sunday, December 4, 2011

वह पगली

वह पगली यहाँ - वहाँ बुझे अलावो को कुरेद रही थी ,
सीत्कारती जलते हाथ को सहलाती ,
मासूम बालक सा दुलारती ,
मशगूल फिर उष्ण आग को इधर - उधर छितराती,
देखती रही उसे काफी देर ,
पर रोक न पाई अपनेआप को ,
पास जा बोली ,अरी पगली ..
क्या करती है , जलाएगी क्या खुद को ,
सर उठा निर्विकार दृष्टि से देखा मुझे ,
फिर देखा सपाट नज़रों से अपनी हथेली को ....
कुछ देर रुकी और बोली ....
कुरेद रही हूँ अपने , बुझे सपनों की राख ,
शायद कहीं हो कोई चिंगारी अभी बाकी........!!!

Wednesday, November 30, 2011

छंटनी


कल मौसम का इशारा समझ ,
निकल पड़े झील किनारे ,
धूली धूप चमक रही थी लहरों पर,
घास ,पाती की परछाई दे रही थी निमंत्रण  
निकल पड़े हम दूर साहिल तट पर, 
भर  ली झोली ,रंग बिरंगी सीपियो से ,
अपनी धुन मे मगन चुन रहे थे स्वस्थ और सुंदर ,
तभी पैर में चुभा एक टूटा शंख ,
मुहं चिडाता बोला ...........
स्वार्थी इंसान ,
कर ली न छंटनी  , अपनी सुविधा अनुसार ,
तुम लोग भी न , नहीं सह पाते जरा सा भी भोथरापन,
जन्म से ही आदत है तुम्हे चुनने की ,
जो, कितना भी सोचो जाती नहीं ,
तुम्हारे  भीतर का खोखलापन
बाहर तलाशता रहता है सम्पूर्णता .
रिक्त , शून्य , खंडित मन ,
भागता है , विपरीत सौन्दर्य के पीछे ,
यही है " सृष्टि का सत्य "
अगर कोई करने लगे तुम्हारी भी छंटनी ???????????????????

Monday, November 28, 2011

पता नहीं ?


उनका मन बहुत दयालू है ,
प्रतिमाह फटी - पुरानी उतरन ,खिलौने ,
पास की झोपड़ -पट्टी में दे आती हैं |
पहनने वालों का तो पता नहीं ,
वह स्वयं अख़बारों में छप जाती हैं |

उनका मन बहुत उदार है ,
प्रतिवर्ष एक डरा- सहमा बालक ,
गाँव से उधार ले आती हैं ,
बच्चे का तो पता नहीं ,
वह स्वयं तारीफ़ तले दब जाती हैं |

उनका मन बहुत कोमल है ,
हर हफ्ते नारी निकेतन के चक्कर लगाते हैं ,
किसी मासूम कन्या को ,
अपने माली की बीवी बना लाते हैं|
माली का तो पता नहीं ,
वह रोज़ ताज़े गुलदस्ते सजवाते हैं |
इति.....

Saturday, November 26, 2011

अब समझती हूँ माँ.....!!!

तब लगती थी हर बात नसीहत 
हर टोक पर होती थी झुंझलाहट 
तब नहीं समझी पर अब समझती हूँ माँ......
माँ बन कर जान पाई हूँ तेरी उलझन माँ 
वो इम्तिहान के वक़्त वही बैठे रहना 
आधी रात को उठ चाय का बनाना ,
सब कुछ दोहरा लिया न की रट लगाना , यह सब कितना किलसाता था , तब नहीं समझी पर अब समझती हूँ माँ .. मेरे इंतज़ार में दरवाजे पर खड़े रहना , कहाँ रह गयी थी अब तक कह झिडकना , हाथ से बस्ता ले चल खा ले अब कुछ , तेरी ही पसंद का बनाया है कह दुलारना , अब मैं भी कुछ कुछ तेरी जैसी हो गयी हूँ माँ ,. तब नहीं समझी पर अब समझती हूँ माँ.....!!!

Tuesday, November 22, 2011

कुछ नहीं भूली हूँ मैं

 नहीं भूली हूँ मैं,
पूस की बर्फीली रात में,
नलके के नीचे बर्तन रगड़ना,
सबको सुला बत्ती बुझा ,
चुपके से सोना ,
नहीं भूली हूँ मैं.....!
जून की तपती लू में,
थैला पकड़ बाज़ार जाना ,
सबकी पसंद की चीजें ,
लड़ - झगड़ के बनिए से लाना ,
नहीं भूली हूँ मैं.....!
सावन की छमछमाती बरसात में,
छाता ले स्टॉप से बच्चों को लाना ,
टपटपाती साडी में कंपकंपाते हुए ,
जल्दी - जल्दी कलछुल का चलाना ,
नहीं भूली हूँ मैं.....!
सब याद है मुझे ....माँ,
कुछ भी नहीं भूली हूँ मैं ...!!!