Tuesday, December 20, 2011

ज़िंदगीनामा

अपने जन्मदिन की पूर्व संध्या पर 
खुली किताब सी यह जिंदगी 
ढेरों किस्से औ कहानी,,
कुछ गम्भीर ,कुछ चुटकीले,
कुछ दुखद भीगे - भीगे ,
कुछ खुशी के खिले खिले ,
रंग - बिरंगे- स्याह -सफ़ेद पन्ने इसके ...
प्यार -गुस्सा -रूठना -मनाना,
ख्वाब -हकीकत -सच -झूठ 
विश्वास - आधार - आस्था  - संबध ,
कुछ पन्ने अब भी है अनछुए ...
कोरे - कड़क- स्याही से महके ,
कुछ हो गए ज़र्रजर - क्षत- विक्षत ,
बार - बार -लगातार उलटते - पलटते ,
कुछ की इबारत है इतनी सरल - सहज ,
समझ पाने में होती नहीं कोई अड़चन ,
कुछ हैं इतने अधिक दुरूहू -कठिन ,
कितना पटकूं सर नही आते समझ ...
जीवन के इस मध्यांतर पन्ने पे ,
अब भी लगता है जैसे अब भी हूँ ,
अपने आप से अपरिचित -अनजान,
खुद में - खुद को तलाशती - कुरेदती ,
रोज़ ही जुड़ जाता है नया कोई पन्ना ,
यही अब तक का ज़िंदगीनामा ..................



Friday, December 16, 2011

मुंह के बल


लोंगो की भीड़ मे, दबी |
लम्बी, पतली, गोरी, नाजुक, वह |
बड़ी अदा से इशारा करती , उकसाती,
ब़ार- ब़ार झांकती , कहती ,
एक ब़ार तो हमें  आजमाओ |
जिन्दगी का कश लगाओ |

दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच  गयी है,
तुम अभी तक वही खड़े हो,
अपनी जिद्द पर अड़े हो |
सब गम भूल  जाओगे ,
बस एक के बाद एक ,और हमें ही ,
याद करते रह जाओगे |

हमने भी इशारे को समझा ,
पर मन थोडा झिझका ,
दिमाग ने तो रोका ,पर दिल के आगे ,
उसकी नहीं चल पाई|

लपक कर हमने उसकी तरफ हाथ बढाया,
उंगलियों मे दबा कर बड़े प्यार से सहलाया ,
बड़ी नजाकत से होठो से लगाया |
पहेले ही कश मे ........................बेदम कर गयी,
यह तो अंगार थी ,
नाक ,आंख सब  धुएं से भर गयी |

हम तो कर रहे थे सिगरेट की बात ,
आप तो कुछ और ही समझे यार |

इस पतली ,गोरी , नाजुक मे जो नशा है ,
वह भला किसी से क्या छिपा है ,
बनाने वाले भी करते है इसका  विरोध 
पर पीने वाले मानते नहीं यह अनुरोध |

हम तो यही कहेगे इसके चक्कर में न आना ,
नही तो पड़ेगा अस्पताल  जाना |
यह है मीठा नशा ,जो करता  है शरीर तबहा|

इति 

Tuesday, December 13, 2011

धूल

माना की तेरी नज़र में  मेरी कोई औकात नहीं ,
राह मे बिखरी धूल ही सही ,
मत भूल हवा की मनमानी ,
किरकिरी बन पड़ गयी तो ,
आँख मलता रहेगा ,
ता उम्र यूँ ही ...

Saturday, December 10, 2011

pravah

तुम्हारी पेशानी पर झलकते ,
स्वेद - बिन्दुओ को ,'
आँचल मे सह्जेने को जी चाहता है

जी चहता है ,
स्वेद - बिन्दुओ के हेतु
सिमट आए मेरे आँचल मे ,
तो यह आँचल सार्थक हो

तुम्हारे राज में हमराज बन
खो जाने को जी कहता है

जी कहता है ऐसे ही खो जाने से
महामिलन की अनुभूति ,
प्राप्त हो मुझे भी एक ब़ार

पलको पर घिर आए ,
तुम्हारे इस गीलेपन को
पी जाने को जी कहता है

जी कहता है
और यह प्रयास
बन जाए प्रतीक
हमारे अनंत में खो जाने का

तुम और में का विभाजन
समाप्त कर ,
तुम से मे , में कहलाऊ
जी कहता है
इति.....................

Sunday, December 4, 2011

वह पगली

वह पगली यहाँ - वहाँ बुझे अलावो को कुरेद रही थी ,
सीत्कारती जलते हाथ को सहलाती ,
मासूम बालक सा दुलारती ,
मशगूल फिर उष्ण आग को इधर - उधर छितराती,
देखती रही उसे काफी देर ,
पर रोक न पाई अपनेआप को ,
पास जा बोली ,अरी पगली ..
क्या करती है , जलाएगी क्या खुद को ,
सर उठा निर्विकार दृष्टि से देखा मुझे ,
फिर देखा सपाट नज़रों से अपनी हथेली को ....
कुछ देर रुकी और बोली ....
कुरेद रही हूँ अपने , बुझे सपनों की राख ,
शायद कहीं हो कोई चिंगारी अभी बाकी........!!!

Wednesday, November 30, 2011

छंटनी


कल मौसम का इशारा समझ ,
निकल पड़े झील किनारे ,
धूली धूप चमक रही थी लहरों पर,
घास ,पाती की परछाई दे रही थी निमंत्रण  
निकल पड़े हम दूर साहिल तट पर, 
भर  ली झोली ,रंग बिरंगी सीपियो से ,
अपनी धुन मे मगन चुन रहे थे स्वस्थ और सुंदर ,
तभी पैर में चुभा एक टूटा शंख ,
मुहं चिडाता बोला ...........
स्वार्थी इंसान ,
कर ली न छंटनी  , अपनी सुविधा अनुसार ,
तुम लोग भी न , नहीं सह पाते जरा सा भी भोथरापन,
जन्म से ही आदत है तुम्हे चुनने की ,
जो, कितना भी सोचो जाती नहीं ,
तुम्हारे  भीतर का खोखलापन
बाहर तलाशता रहता है सम्पूर्णता .
रिक्त , शून्य , खंडित मन ,
भागता है , विपरीत सौन्दर्य के पीछे ,
यही है " सृष्टि का सत्य "
अगर कोई करने लगे तुम्हारी भी छंटनी ???????????????????

Monday, November 28, 2011

पता नहीं ?


उनका मन बहुत दयालू है ,
प्रतिमाह फटी - पुरानी उतरन ,खिलौने ,
पास की झोपड़ -पट्टी में दे आती हैं |
पहनने वालों का तो पता नहीं ,
वह स्वयं अख़बारों में छप जाती हैं |

उनका मन बहुत उदार है ,
प्रतिवर्ष एक डरा- सहमा बालक ,
गाँव से उधार ले आती हैं ,
बच्चे का तो पता नहीं ,
वह स्वयं तारीफ़ तले दब जाती हैं |

उनका मन बहुत कोमल है ,
हर हफ्ते नारी निकेतन के चक्कर लगाते हैं ,
किसी मासूम कन्या को ,
अपने माली की बीवी बना लाते हैं|
माली का तो पता नहीं ,
वह रोज़ ताज़े गुलदस्ते सजवाते हैं |
इति.....