Friday, January 20, 2012

.....'जान'.............

जब -जब मन तरसता सुनने को तुम्हारी आवाज़ ,
बंद कर पलकों के दरिन्चो करती हूँ प्रयास ,
कोशिश करती हूँ बार - बार ,
सुनती हूँ तुम्हे अपने ही आप ,
तुम्हारा, वो कहना.. 'जान ',
जैसे वीणा का कोई मद्धम राग ,
घुल जता है संगीत मेरी नस नस में
और बहने लगती है खुशबू पोर- पोर में ....
जैसे उतरी हो कुआंरी- कच्ची धूप ,
मन के सर्द - सूने आंगन में ,
जिस्म में फैल जाती एक गुनगुनाहट ,
तुम्हारे इश्क की .........
पल- भर को रुक जाती है धडकन ,
लुप्त हो जाती है चेतना ,
थम जाता है सारा ब्रह्मांड ,
अस्यंमित हो जाती है साँस,
बस तुम्हारे कहने भर से
.....'जान'..............

Thursday, January 5, 2012

khaas lamha

चंद छोटे से लम्हे के लिए ही सही ,
टूट कर किया मैने तुमसे प्यार |
 गर्म भाप उठी प्याले से चंद पलों के लिए,
दे गयी ताजगी उस वक़्त  |
गोलगप्पे की खटास उस पल में ,
जीभ को करती तुर्श उस क्षण |
हो फिर कुछ पल को ठंडी कुल्फी का
जुबान को सुन्न  करता आभास |
पहाड़ों पर गोल होती सडक का जैसे ,
खत्म हो  जाने का अहसास |
हवा के पलटे रुख के साथ ,
महीन आंचल का सरसराता स्पर्श |
किसी की याद मे भीगते - उलझते ,
बारिश की बूंद से गीले ज़ज्बात |
बाँहों के घेर मे उठी - गिरती ,
एकतार होती धड़कन की सरगम |
बस वही एक पल ...लम्हा ..क्षण..
....... होता है खास ....!!!!!


Tuesday, January 3, 2012

पिताजी की पुण्य तिथि पर


आँगन में धूप सेंकते- सेंकते ,
अखबार के पन्ने पलटते,
गर्म चाय की चुस्कियों के साथ ,
सबके दुख - सुख बांचते 
पिताजी .......!!
स्कूटर मेंबार बार कीक मारते,
हैंडल  पे लटका खाने  का थैला ,
पिछली सीट पे पडोसी के बच्चे को बिठा ,
बीच रस्ते में कहीं छोड़ते ,
पिताजी .....!!
बड़े रुमाल में गंडेरीयों की सौगात ,
दोनों तरफ झोलों में तरकारी और फलों की बरसात ,
मंदिर की घंटी और प्रसाद ,
धूप और कपूर की तरह ,
पिताजी ............!! 

Wednesday, December 28, 2011

nav varsh ki shubkamana

मैने कहा समय से ,
भूल जाओ क्या हुआ गत वर्ष ,
वह गम - थकान - औ विषाद ,
याद रखो बस वह लम्हा ,
जब आई होठों पे मुस्कान .
...वह देखो घर के आँगन से ,
बीच सड़क तक फैली है ,
नये साल की नई किरण .......
कल जाने क्या होगा ,
यह सोच न करूँ वक़्त बर्बाद ,
आज अभी जो लम्हा है ,
मेरा है सिर्फ मेरा ही मेरा ,
इसको कर लूँ मुट्ठी में बंद ,
हो जाये मुबारक यह साल......
आप सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ

Tuesday, December 20, 2011

ज़िंदगीनामा

अपने जन्मदिन की पूर्व संध्या पर 
खुली किताब सी यह जिंदगी 
ढेरों किस्से औ कहानी,,
कुछ गम्भीर ,कुछ चुटकीले,
कुछ दुखद भीगे - भीगे ,
कुछ खुशी के खिले खिले ,
रंग - बिरंगे- स्याह -सफ़ेद पन्ने इसके ...
प्यार -गुस्सा -रूठना -मनाना,
ख्वाब -हकीकत -सच -झूठ 
विश्वास - आधार - आस्था  - संबध ,
कुछ पन्ने अब भी है अनछुए ...
कोरे - कड़क- स्याही से महके ,
कुछ हो गए ज़र्रजर - क्षत- विक्षत ,
बार - बार -लगातार उलटते - पलटते ,
कुछ की इबारत है इतनी सरल - सहज ,
समझ पाने में होती नहीं कोई अड़चन ,
कुछ हैं इतने अधिक दुरूहू -कठिन ,
कितना पटकूं सर नही आते समझ ...
जीवन के इस मध्यांतर पन्ने पे ,
अब भी लगता है जैसे अब भी हूँ ,
अपने आप से अपरिचित -अनजान,
खुद में - खुद को तलाशती - कुरेदती ,
रोज़ ही जुड़ जाता है नया कोई पन्ना ,
यही अब तक का ज़िंदगीनामा ..................



Friday, December 16, 2011

मुंह के बल


लोंगो की भीड़ मे, दबी |
लम्बी, पतली, गोरी, नाजुक, वह |
बड़ी अदा से इशारा करती , उकसाती,
ब़ार- ब़ार झांकती , कहती ,
एक ब़ार तो हमें  आजमाओ |
जिन्दगी का कश लगाओ |

दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच  गयी है,
तुम अभी तक वही खड़े हो,
अपनी जिद्द पर अड़े हो |
सब गम भूल  जाओगे ,
बस एक के बाद एक ,और हमें ही ,
याद करते रह जाओगे |

हमने भी इशारे को समझा ,
पर मन थोडा झिझका ,
दिमाग ने तो रोका ,पर दिल के आगे ,
उसकी नहीं चल पाई|

लपक कर हमने उसकी तरफ हाथ बढाया,
उंगलियों मे दबा कर बड़े प्यार से सहलाया ,
बड़ी नजाकत से होठो से लगाया |
पहेले ही कश मे ........................बेदम कर गयी,
यह तो अंगार थी ,
नाक ,आंख सब  धुएं से भर गयी |

हम तो कर रहे थे सिगरेट की बात ,
आप तो कुछ और ही समझे यार |

इस पतली ,गोरी , नाजुक मे जो नशा है ,
वह भला किसी से क्या छिपा है ,
बनाने वाले भी करते है इसका  विरोध 
पर पीने वाले मानते नहीं यह अनुरोध |

हम तो यही कहेगे इसके चक्कर में न आना ,
नही तो पड़ेगा अस्पताल  जाना |
यह है मीठा नशा ,जो करता  है शरीर तबहा|

इति 

Tuesday, December 13, 2011

धूल

माना की तेरी नज़र में  मेरी कोई औकात नहीं ,
राह मे बिखरी धूल ही सही ,
मत भूल हवा की मनमानी ,
किरकिरी बन पड़ गयी तो ,
आँख मलता रहेगा ,
ता उम्र यूँ ही ...